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【 गत ब्लॉग से आगे 】

🌹 इष्टदेव की उपासना :

न नमन करता हूँ, न किसी दूसरे की स्तुति करता हूँ, न अन्य को आँख से देखता हूँ, न स्पर्श करता हूँ, न अन्यत्र कहीं जाता हूँ, न बिना हरि के अन्य का गान करता हूँ।’’ इत्यादि श्लोकों के द्वारा अनन्यता का स्वरूप प्रदर्शित किया है। इतना सब मन्थन करने का तात्पर्य यही है कि भगवान श्रीवासुदेव की उपेक्षा करके अन्य देवों का समाश्रयण करना अभिप्रेत नहीं, अपितु वासुदेव-भावना से या भगवान की आराधना-बुद्धि से अन्य देवताओं का भी आदर अवश्य ही करना उचित हैं इसीलिए काशीखण्ड में आगे चलकर लिखा है कि श्रीविष्णु की आज्ञा से ध्रुव ने भगवान श्रीविष्णु के उपास्य श्रीशंकर भगवान की पूजा की। ध्रुव को वरदान आदि देकर भगवान श्रीविष्णु ने उनसे कहा:-

ध्रुवावधेहि वक्ष्यामि हितं तव महामते।
येन ते निश्चलं सम्यक्पदमेतद्भविष्यति।।
अहं जिगमिषुस्त्वां पुरीं वाराणसीं शुभाम्।
साक्षाद्विश्वेश्वरो यत्र तिष्ठते मोक्षकारणम्।।
विपन्नानां च जन्तूनां यत्र विश्वेश्वरः स्वयम्।
कर्णे जापं प्रकुरुते कर्मनिर्मूलनक्षमम्।।
अलपसंसारदुःखस्य सर्वोपद्रवदायिनः।
उपाय एक एवास्ति काशिकाऽऽनन्दभूमिका।।
इदं रम्यमिदं नेति बींज दुःखमहातरोः।
तस्मिन् काश्यग्निना दग्धे दुःखस्यावसरः कुतः।।
प्रार्थ्य सम्प्राप्यते येन न भूयो येन शोच्यते।
वैकुण्ठनगरात्कशीं नित्यं विश्वेशमर्चितुम्।।
अहमायामि नियमाज्जगदार्यां तदंचिताम्।
मायायाः परमाशक्तिस्त्रिलोक्या रक्षणक्षमा।
तत्र हेतुर्महेशानः स सुदर्शनचक्रदः।।

【 शेष आगे के ब्लॉग में 】

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 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
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