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❄ भगवत्प्राप्ति ❄

【 गत ब्लॉग से आगे 】

हे कमलनयन! मेरा मन आपको देखने के लिए वैसे ही उत्कण्ठित होता है-

‘‘अजातपक्षा इव मातरं खगाः स्तन्यं यथां वत्सतरा क्षुधार्त्तः।
प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा मनोऽरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम्।।’’

इस प्रकार की सोत्कण्ठ भक्त की प्रार्थना से भगवान द्रवित होकर भक्त से मिलने को दौड़ पड़ते हैं।

हाँ, यह ठीक है कि भगवत्सम्मिलन की ऐसी उत्कट उत्कष्ठा सरल नहीं है, किन्तु जन्म-जन्मान्तरों, युग-युगान्तरों के पुण्यपुंज से ही भगवान में उत्कट प्रीति प्राप्त होती है। इसीलिए उपनिषदों ने कहा है कि ब्राह्मणादि अधिकारी लोग यज्ञ, तप दान और अनशनादि सत्कर्मों से उनपरमतत्व भगवान को जानने की उत्कट इच्छा उत्पन्न करते हैं-

‘‘तमेतात्मानं ब्राह्मणा यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन विविदिषन्ति।

जब उस परमतत्व की जिज्ञासा ही उत्पन्न करने में अनेक जन्मों के सत्कर्मों की अपेक्षा होती है, तब स्पष्ट ही है कि जिसे भगवत्सम्मिलन की उत्कट कामना है, जिसे भगवान के न मिलने से महती व्याकुलता है, वह केवल इसी जन्म का सत्कर्मी नहीं, अपितु पहले जन्मो से भी उसका इस सम्बन्ध में प्रयत्न चल रहा है। इस दृष्ठि से ध्रुव ही जन्मान्तरीय तपस्याओं तथा -

 ‘‘बहुनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते।’’

इत्यादि वचनों की संगति लग जाती है। प्रेम के उत्कट हो जाने पर उसी क्षण भगवान का दर्शन होता है। फूल तोड़ने में विलम्ब हो सकता है, किन्तु उस समय भगवान के मिलने में किंचित भी विलम्ब नहीं होता । भगवान प्राणियों के अन्तरात्मा, सर्वसाक्षी हैं, उनको पाने में कौन कठिनाई ?-

‘‘कोऽतिप्रयासोऽसुरबालका हरेरूपासने स्वे हृवि छिद्रवत्सतः।’’

इत्यादि बातों की भी संगति लगती है। भगवत्प्राप्ति में अत्यन्त प्रयत्न करने की अपेक्षा बतलाने के लिए शास्त्रों ने भगवान को अत्यन्त दुर्लभ कहा है, निराशा मिटाकर उत्साह बढ़ाने के लिए भगवान को अत्यन्त सुगम भी कहा है-

‘‘दुरात्सुटूरे अन्तिकात् तदु अन्ति के च।’’

भगवान दूर-से-दूर और समीप से भी समीप है।

【 शेष आगे के ब्लॉग में 】

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