🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩
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🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹🔱 💠 भक्ति ⚜ सुधा 💠 🔱🌹
【 गत ब्लॉग से आगे 】
❄ मानसी-आराधना :
अजगर रूपधारी अघासुर के मुख में भगवान श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द ने भी अपने बछड़ों की रक्षा के लिये प्रवेश किया। अघासुर अपनी आजगर देह को छोड़ भगवान के स्वरूप में मिल गया। साधारण दृष्टि से यहाँ आश्चर्य हो सकता था कि गो-ब्रह्मणों के मांस-रूधिरों से उदर-पोषण करनेवाले, देव-धर्म-शास्त्रद्रोह उस असुर को भगवत्सायुज्य पद कैसे प्राप्त हुआ? इसी पर ‘श्रीमद्भागवत’ में श्रीशुक्र ने परीक्षित से कहा राजन् ! जिसके मंगलमय श्रीअंग की मानसी-प्रतिभा एक बार हृदय में धारण करने मे अपरिगणित प्राणियों को मुक्ति प्राप्त हो जाती है, वे मायातीत सच्चिदानन्द भगवान जिसके हृदय में साक्षात् प्रविष्ट हुए उसके सायुज्य (मुक्ति) में क्या आश्यर्च-
‘‘सकृद्यदंगप्रतिमान्तराहित मनोमयी भागवती ददौ गतिम्
स एवनित्यात्मसुखानुभूत्यभिर्व्युस्तमायोऽन्तर्गतो हि किं गुनः।।’’
भगवान के मंगलमय श्रीअंग की काष्ठमयी, धातुमयी प्रतिमा भी श्रद्धा-उत्कण्ठापूर्वक हृदय में धारण और चिन्तन करने से प्राणियों को परम सद्गति प्रदान करती है। जिन महानुभावों के अन्तर हृदय में भगवान के श्री-अंग की मनोमयी प्रतिमा सदा विराजमान रहती है वे तो अपना ही क्या, विश्व का कल्याण कर सकते हैं। वे भगवान की मानसी मूर्ति के ध्यान को ही परम पुरुषार्थ मानते हैं, त्रिभुवन-सम्पत्ति के लिये भगवान के मंगलमय श्रीचरणारविन्द से लव या अर्ध निमेष भी नहीं चलायमान होते ।
जिस हृदय में भगवान के चरणारविन्द की नखचन्द्र - चन्द्रिका विस्तीर्ण है, वहाँ शोक-मोह, पाप-ताप रह ही कैसे सकते हैं? जिस तरह शैत्य के योग से निर्मल जल ही बर्फ, ओला रूप से अपलब्ध होता है, किंवा घृत-वर्तिका या विचित्र जलादि के संघर्ष से अदृश्य व्यापक अग्नि ही दाहकत्व प्रकाशकत्व विशिष्ट दीपशिखा या विद्युल्लता-रूप में अभिव्यक्त होती है, उसी तरह विशुद्ध सत्वमयी स्वेच्छा या कृपा के योग से ही अदृश्य, अनन्त, आनन्दसुधाम्बुनिधि परम तत्व ही माया से अनभिभूत या असंस्पृष्ट दिव्य मूर्तिमान होकर व्यक्त होते हैं।
【 शेष आगे के ब्लॉग में 】
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🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
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🌹: कृष्णा श्री राधाप्रेमी : 🌹
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अजगर रूपधारी अघासुर के मुख में भगवान श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द ने भी अपने बछड़ों की रक्षा के लिये प्रवेश किया। अघासुर अपनी आजगर देह को छोड़ भगवान के स्वरूप में मिल गया। साधारण दृष्टि से यहाँ आश्चर्य हो सकता था कि गो-ब्रह्मणों के मांस-रूधिरों से उदर-पोषण करनेवाले, देव-धर्म-शास्त्रद्रोह उस असुर को भगवत्सायुज्य पद कैसे प्राप्त हुआ? इसी पर ‘श्रीमद्भागवत’ में श्रीशुक्र ने परीक्षित से कहा राजन् ! जिसके मंगलमय श्रीअंग की मानसी-प्रतिभा एक बार हृदय में धारण करने मे अपरिगणित प्राणियों को मुक्ति प्राप्त हो जाती है, वे मायातीत सच्चिदानन्द भगवान जिसके हृदय में साक्षात् प्रविष्ट हुए उसके सायुज्य (मुक्ति) में क्या आश्यर्च-
‘‘सकृद्यदंगप्रतिमान्तराहित मनोमयी भागवती ददौ गतिम्
स एवनित्यात्मसुखानुभूत्यभिर्व्युस्तमायोऽन्तर्गतो हि किं गुनः।।’’
भगवान के मंगलमय श्रीअंग की काष्ठमयी, धातुमयी प्रतिमा भी श्रद्धा-उत्कण्ठापूर्वक हृदय में धारण और चिन्तन करने से प्राणियों को परम सद्गति प्रदान करती है। जिन महानुभावों के अन्तर हृदय में भगवान के श्री-अंग की मनोमयी प्रतिमा सदा विराजमान रहती है वे तो अपना ही क्या, विश्व का कल्याण कर सकते हैं। वे भगवान की मानसी मूर्ति के ध्यान को ही परम पुरुषार्थ मानते हैं, त्रिभुवन-सम्पत्ति के लिये भगवान के मंगलमय श्रीचरणारविन्द से लव या अर्ध निमेष भी नहीं चलायमान होते ।
जिस हृदय में भगवान के चरणारविन्द की नखचन्द्र - चन्द्रिका विस्तीर्ण है, वहाँ शोक-मोह, पाप-ताप रह ही कैसे सकते हैं? जिस तरह शैत्य के योग से निर्मल जल ही बर्फ, ओला रूप से अपलब्ध होता है, किंवा घृत-वर्तिका या विचित्र जलादि के संघर्ष से अदृश्य व्यापक अग्नि ही दाहकत्व प्रकाशकत्व विशिष्ट दीपशिखा या विद्युल्लता-रूप में अभिव्यक्त होती है, उसी तरह विशुद्ध सत्वमयी स्वेच्छा या कृपा के योग से ही अदृश्य, अनन्त, आनन्दसुधाम्बुनिधि परम तत्व ही माया से अनभिभूत या असंस्पृष्ट दिव्य मूर्तिमान होकर व्यक्त होते हैं।
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