🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹🔱 💠 भक्ति ⚜ सुधा 💠 🔱🌹

【 गत ब्लॉग से आगे 】

🌹 इष्टदेव की उपासना :

यदि कहा जाय कि वहाँ उन इन्द्रादि देवताओं के रूप में भगवान विष्णु की ही पूजा होती है, तो इस तरह फिर सभी देवताओं की पूजा की जा सकती है। जिन कामिनी, कांचन आदि विषयों की बड़े-बडे विवेकी महापुरुषों ने निन्दा की है, उन्हीं तुच्छ विषयरूप विष से भस्मीभूत चित्तवाले, और उन्हीं विषयों की प्राप्ति के लोभ से वशीभूत होकर, और तो क्या म्लेच्छों के चरणों पर मस्तक झुकाने वाले लोग समस्त पाप-समुदाय का नाश करने में समर्थ श्रीशिव, विष्णु आदि के वन्दन को जब अनन्यता का विघातक कहते हैं तब बड़ा आश्चर्य होता है। अस्तु, इस तरह यह सिद्ध होता है कि श्रीभगवान को प्रसन्न करने की वृद्धि से भगवान के लिए किये गये समस्त कर्मों को परमगुरु श्रीभगवान के चरणों में समर्पण करना ही यथार्थ अनन्यता है।

इत्यादि वचनों से शास्त्रों ने अपने-अपने वर्ण-आश्रम के अनुसार श्रौत-स्मार्त कर्मो से ही श्रीभगवान को उपसना करना बतलाया है और श्रौत-स्मार्त कर्मों में तो पद-पद पर इन्द्र, अग्नि, वरुण, रुद्र, प्रजापति आदि देवताओं की पूजा दिखलाई पड़ती है। ऐसी हालत में अपने को वैदिक मानने वाला कोई पुरुष यह कहने का साहस कैसे कर सकता है कि ‘‘विष्णु के सिवाय कोई अन्य देवता मेरे लिए पूजनीय नहीं है?’’ काशीखण्ड के दूसरे अध्याय में ध्रुवजी श्रीविष्णु से स्तुति में कहते हैं कि:-

मित्राणां कि कलत्रं त्वं धर्मस्त्वं सर्वबन्धुषु।
त्वतो नान्यज्जगत्यस्मिन्नारायण ! चराचरे।।
त्वमेव माता त्वं तातस्तवं सुहृत्वं महाघनम्।
त्वमेव सौख्यसम्पत्तिस्त्वमेव जीवनेश्वरः।।
सा कथा यत्र ते नाम तन्मनो यत्तवदर्पितम्।
तत्कर्म यत्वदर्थ वै तत्तपो यद्भवत्स्मृतिः।।

【 शेष आगे के ब्लॉग में 】

 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹         

🌹 प्रियभगवद्जन... धार्मिक पोस्ट पाने या हमारे सत्संग में सामिल होने के लिए हमें श्री "राधे राधे"... शेयर करें 💐
 : मोबाइल नम्बर .9009290042 :

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※

टिप्पणियाँ