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  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
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  🌹🔱 💠 भक्ति ⚜ सुधा 💠 🔱🌹

【 गत ब्लॉग से आगे 】

🌹 इष्टदेव की उपासना :

अहो! पुंसां महामोहस्त्वहो ! पुंसां प्रमादिता।
वासुदेवमनादृत्य यदन्यत्र कृतश्रमाः।।
नाधोक्षजात्परो धर्मो नाऽर्थो नारायणात्परः।
न कामः केशवादन्यो नापवर्गों हरिं बिना।।
इयमेव परा हानिरुपसर्गोऽयमेव हि।
अभाग्यं परमं चैतद्वासुदेवं ने यत्स्मरेत्।।
गोविन्द परमानन्दं मुकुन्दं मुधुसूदनम्।
र्त्तयक्त्वाऽन्यं नैव जानामि न स्मरामि भजामि च।।
न नमामि न च स्तौमि न पश्यामोह चक्षुषा।
न स्पृशामि न वा यामि गायामि न हरिं विना ।।

अर्थात ‘‘ हे नारायण ! इस स्थावर-जंगमात्मक जगत में आपसे अन्य कुछ भी नहीं है। मित्रो में भार्या, सब बन्धुओ में परम हितैषी धर्म आप ही हैं। माता, पिता, सुहृत्, धन, सौख्य, सम्पति, और तो क्या प्राणेश्वर आप ही हैं। कथा वही है जिसमें आपका नाम हो मन वही है जो आपमें अर्पित हो, काम वहीं है जो आपके लिए ही किया जाय और वही तपस्या है, जिसमें आपका स्मरण होता रहे। प्रणियों के उस महामोह को, उस प्रमादिता को देखकर बड़ा ही खेद और आश्चर्य होता है, जिससे आपका अनादर करके अन्य विषयों में महान परिश्रम करते हैं। हे भगवान ! आपसे श्रेष्ठ ऐसा अन्य धर्म है, न अर्थ , न काम और न मोक्ष ही। भगवान वासुदेव का स्मरण न होना ही परम हानि, परम उपद्रव, परम दौर्भाग्य है। परमानन्दकन्द मधुसूदन भगवान गोविन्द को छोड़कर मैं न तो अन्य किसी को जानता ही हूँ, न स्मरण करता हूँ, न भजता हूँ।

【 शेष आगे के ब्लॉग में 】

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 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
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