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  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
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  🌹🔱 💠 भक्ति ⚜ सुधा 💠 🔱🌹

【 गत ब्लॉग से आगे 】

🌹नामरूप की उपयोगिता :

नामरूपक्रियातीत, अनाम, अरूप, निष्क्रिय परमतत्व की प्राप्ति के लिए ही प्राणी को अनके क्रियाओं, नामों एवं रूपों का अवलम्बन करना पड़ता है। अनाम के नामकरण एवं अरूप के रूप की कल्पना सचमुच अपरिमेय को परिमित और निःसीम को सीमित करना है। किसी महानुभाव ने कहा है-

‘‘गत्याऽनया व्यापकता हता ते, स्तुत्यानयावाक्परता हताते।
दृष्ट्याऽनयाऽगोचरता तथा हता, ममापराधस्त्रितयं क्षमस्व।।’’

अर्थात् ‘‘हे नाथ, इतने दूर आपके दर्शनार्थ चलकर मैंने आपकी व्यापकता पर तथा दर्शन से आपकी अगोचरता, पर अविश्वास किया और स्तुति से आपकी वाक्परता की भी अवहेलना की। हे दयामय, इन मेरे अपराधों को कृप्या आप क्षमा करना।’’

जैसे प्राणी व्यष्ठि नाम रूप की उपाधि में आसक्त होकर व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए समष्टि-हित का विघातक बन जाता है या समष्टि-हित कर्यों में भी सम्मान, ख्याति या धन-लाभादि स्वार्थों को ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में प्रधानता देने लगता है, वैसे ही सर्वाधार, परमतथ्य, पारमार्थिक वस्तु में भी नाम-रूपों की कल्पनाओं से ही नाना विपत्तियों को खडा करता है। सच बात तो यह है कि नाम–विशेष और रूपविशेष के अभिमानवालों को व्यक्तिगत विशिष्ट नामों और रूपों से स्तुति की स्पृहा होती है। ग्राह से पीडित गजराज ने निर्विशेष परब्रह्म का ही स्तवन किया। उस स्तवन में किसी व्यक्तिविशेष या नामरूप की व्यंजना नहीं थी।

उसने यही कहा कि-
‘‘ मैं उस परमतत्व को नमन करता हूँ, जिससे जड़ विश्व चेतित हो रहा है, जो निखिल विश्व का आदि वीज और परेश है, जिससे तथा जिसमें विश्व उत्पन्न तथा स्थित होता है और जिससे उसका धारण होता है। उस स्वयंभू को नमस्कार है, जो पर अपर कार्य-कारण से अतीत है।’’

【 शेष आगे के ब्लॉग में 】

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 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
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