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🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹🔱 💠 भक्ति ⚜ सुधा 💠 🔱🌹
【 गत ब्लॉग से आगे 】
🌹 इष्टदेव की उपासना :
स्वधर्मभ्रष्ट के लिये कहा गया है कि चाहे कितना भी श्रीहरि की भक्ति, किंवा ध्यान में तत्पर क्यों न हो, परन्तु यदि आश्रम के आचारों से भ्रष्ट है, तो वह पतित ही कहा जाता है। यथा-
हरिभक्तिपरो वापि, हरिध्यानपरोऽपि वा।
भ्रष्टो यः स्वाश्रमाचारात्पतितः सोऽभिघीयते।।
अतः चाहे वैष्णव हो, चाहे शैव हो, सबको वेदशास्त्रोक्त स्वधर्म का अनुष्ठान आवश्यक है। द्विजों के जो आचार-व्यवहारचिह्न हैं, वे सभी उसको अत्यन्त आदरणीय होने चाहिये। ‘कोई जिज्ञासु यह पूछ सकता है कि कुछ शैव तथा वैष्णवों का कहना है कि गायत्री, यज्ञोपवीत एवं ब्राह्मणादि धर्म शैव या वैष्णव के लिए गौण हैं, उनके लिये तो अष्टाक्षर पंचाक्षरादि मन्त्र ही का अत्यन्त प्राधान्य होना चाहिये। वेदशास्त्र तथा तदुक वेदश्रम-धर्म के बिना भी केवल शैव एवं वैष्णवधर्म से तदुक वर्णाश्रम–धर्म के बिना भी केवल शैव एवं वैष्णव धर्म से उनका कल्याण हो जाता है। इसका यह उत्तर है कि यद्यपि विष्णुमन्त्रादि प्राणिकल्याण के साधनरूप् में आदरणीय हैं, तथापि वैष्णवतादि से द्विजत्व ही अधिक प्रबल है; क्योंकि द्विजत्व परमेश्वर-दत्त है।
वैष्णवत्व, शैवत्व आदि प्राणि-संपादित हैं, अतः वैष्णवतादि के निमित्त से होने वाले धर्मों का सम्मान अवश्य करना चाहिए परन्तु परमेश्वर दत्त द्विजत्व की रक्षा का भी ध्यान रखना परमावश्यक है। द्विजत्व की अभिव्यक्ति यज्ञोपवीत, भस्म एवं शिखा से होती है, वैष्णवता की अभिव्यक्ति कण्ठी, गोपीचन्दनादि से होती है। वैष्णवता के चिह्नों से द्विजत्व के चिह्नों का तिरस्कार अत्यन्त असंगत है। इसलिये वैदिको के गृह में वैष्णवता को द्विजत्व से अवरुद्ध होकर ही रहना चाहिये। अवैदिको के यहाँ यथारुचि व्यक्त लिंगो से वैष्णवता भले ही रहे।
यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि शैव, वैष्णव, एवं शाक्त इन सभी सम्प्रदायों में प्रधान रूप से दो भेद हो गये हैं- वैदिक, दूसरा अवैदिक। वैदिको के यहाँ वेद तथा वेदोक्त कर्म एवं तदनुसारी लिंगो का प्राधान्य होता है और तदविरुद्ध प्रकार से ही विष्णु, शिव आदि देवताओं की उपासना होती है तथा सभी देवताओं का सम्मान होता है। इन वैदिकों में किसी दूसरे देवता की निन्दा करना पाप समझा जाता है। परन्तु अवैदिक वैष्णवों तथा शैवों के यहाँ वेद या तदुक्त धर्म-कर्म तथा तदनुकूल लिगों का कोई सम्मान नहीं, केवल साम्प्रदायिक आगम तन्त्रादि के अनुसार आचार एवं चिह्नों को ही अधिक सम्मान है। द्विज के लिये वैदिक चिह्नों का तिरस्कार अयुक्त है, शैवत्व या वैष्णवत्व पितृपरम्परा से नियत नहीं है। वैदिक लोगों का तो यही कहना है कि जिस पुत्र के कल्याण के लिये, पिता, माता, पितामह-प्रपितामह आदि ने जिस व्रत का या देवता का अनुष्ठान-आराधन किया हो, उस पुत्र के कल्याण का मूल वही व्रत एवं उसी देवता का आराधन है। ऐसी व्यवस्था मानने से राग-द्वेष मिट जाते हैं। अतः जिसकी मातृ-पितृ-परम्परा में जिस देवता की आराधना प्रचलित हो, उसे उसी देवता के आराधन में तत्पर होना चाहिये।
【 शेष आगे के ब्लॉग में 】
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🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
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🌹: कृष्णा श्री राधाप्रेमी : 🌹
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स्वधर्मभ्रष्ट के लिये कहा गया है कि चाहे कितना भी श्रीहरि की भक्ति, किंवा ध्यान में तत्पर क्यों न हो, परन्तु यदि आश्रम के आचारों से भ्रष्ट है, तो वह पतित ही कहा जाता है। यथा-
हरिभक्तिपरो वापि, हरिध्यानपरोऽपि वा।
भ्रष्टो यः स्वाश्रमाचारात्पतितः सोऽभिघीयते।।
अतः चाहे वैष्णव हो, चाहे शैव हो, सबको वेदशास्त्रोक्त स्वधर्म का अनुष्ठान आवश्यक है। द्विजों के जो आचार-व्यवहारचिह्न हैं, वे सभी उसको अत्यन्त आदरणीय होने चाहिये। ‘कोई जिज्ञासु यह पूछ सकता है कि कुछ शैव तथा वैष्णवों का कहना है कि गायत्री, यज्ञोपवीत एवं ब्राह्मणादि धर्म शैव या वैष्णव के लिए गौण हैं, उनके लिये तो अष्टाक्षर पंचाक्षरादि मन्त्र ही का अत्यन्त प्राधान्य होना चाहिये। वेदशास्त्र तथा तदुक वेदश्रम-धर्म के बिना भी केवल शैव एवं वैष्णवधर्म से तदुक वर्णाश्रम–धर्म के बिना भी केवल शैव एवं वैष्णव धर्म से उनका कल्याण हो जाता है। इसका यह उत्तर है कि यद्यपि विष्णुमन्त्रादि प्राणिकल्याण के साधनरूप् में आदरणीय हैं, तथापि वैष्णवतादि से द्विजत्व ही अधिक प्रबल है; क्योंकि द्विजत्व परमेश्वर-दत्त है।
वैष्णवत्व, शैवत्व आदि प्राणि-संपादित हैं, अतः वैष्णवतादि के निमित्त से होने वाले धर्मों का सम्मान अवश्य करना चाहिए परन्तु परमेश्वर दत्त द्विजत्व की रक्षा का भी ध्यान रखना परमावश्यक है। द्विजत्व की अभिव्यक्ति यज्ञोपवीत, भस्म एवं शिखा से होती है, वैष्णवता की अभिव्यक्ति कण्ठी, गोपीचन्दनादि से होती है। वैष्णवता के चिह्नों से द्विजत्व के चिह्नों का तिरस्कार अत्यन्त असंगत है। इसलिये वैदिको के गृह में वैष्णवता को द्विजत्व से अवरुद्ध होकर ही रहना चाहिये। अवैदिको के यहाँ यथारुचि व्यक्त लिंगो से वैष्णवता भले ही रहे।
यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि शैव, वैष्णव, एवं शाक्त इन सभी सम्प्रदायों में प्रधान रूप से दो भेद हो गये हैं- वैदिक, दूसरा अवैदिक। वैदिको के यहाँ वेद तथा वेदोक्त कर्म एवं तदनुसारी लिंगो का प्राधान्य होता है और तदविरुद्ध प्रकार से ही विष्णु, शिव आदि देवताओं की उपासना होती है तथा सभी देवताओं का सम्मान होता है। इन वैदिकों में किसी दूसरे देवता की निन्दा करना पाप समझा जाता है। परन्तु अवैदिक वैष्णवों तथा शैवों के यहाँ वेद या तदुक्त धर्म-कर्म तथा तदनुकूल लिगों का कोई सम्मान नहीं, केवल साम्प्रदायिक आगम तन्त्रादि के अनुसार आचार एवं चिह्नों को ही अधिक सम्मान है। द्विज के लिये वैदिक चिह्नों का तिरस्कार अयुक्त है, शैवत्व या वैष्णवत्व पितृपरम्परा से नियत नहीं है। वैदिक लोगों का तो यही कहना है कि जिस पुत्र के कल्याण के लिये, पिता, माता, पितामह-प्रपितामह आदि ने जिस व्रत का या देवता का अनुष्ठान-आराधन किया हो, उस पुत्र के कल्याण का मूल वही व्रत एवं उसी देवता का आराधन है। ऐसी व्यवस्था मानने से राग-द्वेष मिट जाते हैं। अतः जिसकी मातृ-पितृ-परम्परा में जिस देवता की आराधना प्रचलित हो, उसे उसी देवता के आराधन में तत्पर होना चाहिये।
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