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  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
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  🌹🔱 💠 भक्ति ⚜ सुधा 💠 🔱🌹

【 गत ब्लॉग से आगे 】

❄ मानसी-आराधना :

जिस ब्रह्म का अभ्यासजन्य संस्कारसंस्कृत अन्तःकरण से जिस रूप में साक्षात्कार होता है, वह अपौरुषेय स्वतःप्रमाण वेदान्त से सम्मत है। अतः वह साक्षात्कार प्रमारूप है, परन्तु अन्यभावनाजन्य प्रत्यक्षों में प्रमाण का संवाद नहीं है। इसके सिवा विधुर भावित कामिनी या शीतातुर भावित अग्नि का साक्षात्कार तो होता है, परन्तु वहाँ तो वे हैं ही नहीं। जब जिसका साक्षात्कार होता हो और वह वस्तु वहाँ न हो, तब उस साक्षात्कार को प्रमा कैसे कहा जा सकता है? परमात्मवस्तु तो सर्वघ सर्वदा ही विराजमान है, अतः उसके प्रमाणान्तरसंवादी साक्षात्कार को भ्रम मानने के कोई भी कारण हुए भी तो वे योगमाया से आवृत होने के कारण सबको नहीं उपलब्ध होते। जिसके प्रति योगमायारूप जवनिका (पर्दा) का अपसारण हो जाता है, उसे ही भगवान का साक्षात्कार होता है।

भगवान के स्वेच्छामय स्वरूप का प्रादुर्भाव कहीं भी हो सकता है। परीक्षित के रक्षार्थ उत्तरा के गर्भ में, प्रह्लाद के रक्षार्थ स्तम्भ में जैसे उनका अविर्भाव हो सकता है, वैसे ही भक्त की भावना से भक्त के हृदय में भी प्रादुर्भाव होता है। इसी लिए भावुको ने कहा है-

‘‘यद्यद्धियातउरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय।’’

अर्थात् भगवान ! भक्त अपनी बुद्धि से आपके जैसे-जैसे रूप की भावना करता है, आप वैसे-वैसे ही स्वरूप को धारण करते हैं। इसीलिये भक्त की इच्छा से ही भगवान का रूप बनता है। प्रथम शास्त्रों और सत्पुरुषों के वचनों से भगवान के स्वरूप और सौन्दर्य, माधुर्य, भूषण, वसन, अंग-उपांग आदि की मन से ही भावना की जाती है और वह भावना नीलमेघ, पंकज, मणि, सूर्य, चन्द्र, विद्युत आदि उपमाओं के ही आधार पर होती है, पश्चात् ध्यान और मानस पूजन की महिमा से वही साधारण-सी ही भावनामयी मूर्ति दिव्य श्रीविग्रहरूप में व्यक्त हो जाती है। इसीलिए यहाँ की भावना केवल मनोराज्य नहीं है।

धातुमयी मूर्ति में यद्यपि ईश्वर के व्यापक होने और मन्त्र की विचित्र शक्ति से उनका आविर्भाव माना जाता है, तथापि भावना की वहा भी बड़ी प्रधानता है। तभी कहा गया है कि भाव में ही देवता है इसलिये भाव ही मुख्य कारण है-

‘‘भावो हि विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम्।’’

साधारण-से-साधारण भोग या नैवेद्य में भावना की महिमा से प्रियत्वसम्पत्ति हो जाती है। भावुक लोग भगवान् के सम्मुख स्थापित नैवेद्य में श्रीलक्ष्मीनिर्मित दिव्यभोग की भावना करते हैं।

【 शेष आगे के ब्लॉग में 】

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