🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩
※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹🔱 💠 भक्ति ⚜ सुधा 💠 🔱🌹
【 गत ब्लॉग से आगे 】
🌹नामरूप की उपयोगिता :
भिन्न-भिन्न नामरूप के अभिमानी देवगण गजेन्द्र की स्थिति देखते थे। उसकी स्तुति भी सुन रहे थे, उसको मुक्त करने में समर्थ भी थे, परन्तु उनके नामरूप में उनकी स्तुति नहीं थी, इसीलिए उनकी प्रवृत्ति गजेन्द्र के रक्षण में नहीं हुई। उसकी रक्षा तो उसीसे हुइ, जो किसी नामरूप विशेष का अभिमानी नहीं था। जो सभी नामों तथा रूपों को अपना ही मानता था। आज भी समाजिक क्षेत्रों में व्यक्तिगत ख्याति या सम्मान की ओर ध्यान न देकर सभी नामों और ख्यातिओं को अपना ही समझकर कार्य में अग्रसर होनेवाले विरले ही होते हैं। नामरूप कल्पना का दुष्परिणाम किसी से छिपा नहीं है। पृथक्-पृथक् परमेश्वर के नाम और उपचार-पद्धतियों पर ही आज भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों में द्वंद्व मच रहा है।
ईसाई, मुसलमान, आर्यसमाज ब्रह्मसमाज के अतिरिक्त सनातनधर्मियों में ही नामरूपों पर इतने साम्प्रदायिक भेद उपस्थित है कि जिसकी कल्पना भी साधारण बुद्धिवाले के मन में नहीं हो सकती। शिव, विष्णु, शक्ति, गणेश, सूर्य आदि भिन्न-भिन्न देवताओं के उपासक अपने-अपने इष्ठ और उपासना-पद्धति का ही महत्व सिद्ध करने के लिए दूसरों की निन्दा और खण्डन में कुछ भी कसर नहीं रखते।
इतना ही क्यों, विष्णु के ही विविध स्वरूपों में इस नाम या इस रूप से मुक्ति होती है, दूसरे से नहीं; श्रीकृष्ण का वंदन अमुक वेशभूषा में ही हो सकता है, दूसरे में नहीं, ऐसे विचित्र विचार भी प्रचलित है, जो वैमनस्थ और विद्वेष के मूल बन रहे हैं। परन्तु फिर भी क्या यह नामरूप और क्रियाओं की कल्पना व्यर्थ है? अभिज्ञों का तो कहना है कि प्राणी जब तक सत्व, रज, तम आदि गुणों और विविध नामरूप एक कार्मों में बँधा हुआ है तब तक उसे गुण एवं नामरूप क्रियाव्यतीत वस्तु का दर्शन और उपलब्धि असम्भव ही है। वेदान्त तो पग-पग पर यही उपदेश करता है कि मनोवचनातीत, अनिर्देश्य, अव्यवहार्य, प्रपंचातीत, परमतत्व ही सब कुछ है, उससे भिन्न कोई भी व्यवहार-विषय तथ्य नहीं है। परन्तु जो अनेक तापों से सन्ताप्त एवं अशान्त है, उसे क्या इन वचनों मात्र में शान्ति हो सकती है?
【 शेष आगे के ब्लॉग में 】
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
★ प्रिय भगवद्जन.... धार्मिक पोस्ट पाने या हमारे सत्संग में सामिल होने के लिए श्री "राधे राधे".... शेयर करें! आपके स्वास्थ्य व प्रसन्नता की मंगल कामना के साथ.."कृष्णा श्री राधाप्रेमी" : मोबाइल नम्बर ~ 9009290042
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भिन्न-भिन्न नामरूप के अभिमानी देवगण गजेन्द्र की स्थिति देखते थे। उसकी स्तुति भी सुन रहे थे, उसको मुक्त करने में समर्थ भी थे, परन्तु उनके नामरूप में उनकी स्तुति नहीं थी, इसीलिए उनकी प्रवृत्ति गजेन्द्र के रक्षण में नहीं हुई। उसकी रक्षा तो उसीसे हुइ, जो किसी नामरूप विशेष का अभिमानी नहीं था। जो सभी नामों तथा रूपों को अपना ही मानता था। आज भी समाजिक क्षेत्रों में व्यक्तिगत ख्याति या सम्मान की ओर ध्यान न देकर सभी नामों और ख्यातिओं को अपना ही समझकर कार्य में अग्रसर होनेवाले विरले ही होते हैं। नामरूप कल्पना का दुष्परिणाम किसी से छिपा नहीं है। पृथक्-पृथक् परमेश्वर के नाम और उपचार-पद्धतियों पर ही आज भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों में द्वंद्व मच रहा है।
ईसाई, मुसलमान, आर्यसमाज ब्रह्मसमाज के अतिरिक्त सनातनधर्मियों में ही नामरूपों पर इतने साम्प्रदायिक भेद उपस्थित है कि जिसकी कल्पना भी साधारण बुद्धिवाले के मन में नहीं हो सकती। शिव, विष्णु, शक्ति, गणेश, सूर्य आदि भिन्न-भिन्न देवताओं के उपासक अपने-अपने इष्ठ और उपासना-पद्धति का ही महत्व सिद्ध करने के लिए दूसरों की निन्दा और खण्डन में कुछ भी कसर नहीं रखते।
इतना ही क्यों, विष्णु के ही विविध स्वरूपों में इस नाम या इस रूप से मुक्ति होती है, दूसरे से नहीं; श्रीकृष्ण का वंदन अमुक वेशभूषा में ही हो सकता है, दूसरे में नहीं, ऐसे विचित्र विचार भी प्रचलित है, जो वैमनस्थ और विद्वेष के मूल बन रहे हैं। परन्तु फिर भी क्या यह नामरूप और क्रियाओं की कल्पना व्यर्थ है? अभिज्ञों का तो कहना है कि प्राणी जब तक सत्व, रज, तम आदि गुणों और विविध नामरूप एक कार्मों में बँधा हुआ है तब तक उसे गुण एवं नामरूप क्रियाव्यतीत वस्तु का दर्शन और उपलब्धि असम्भव ही है। वेदान्त तो पग-पग पर यही उपदेश करता है कि मनोवचनातीत, अनिर्देश्य, अव्यवहार्य, प्रपंचातीत, परमतत्व ही सब कुछ है, उससे भिन्न कोई भी व्यवहार-विषय तथ्य नहीं है। परन्तु जो अनेक तापों से सन्ताप्त एवं अशान्त है, उसे क्या इन वचनों मात्र में शान्ति हो सकती है?
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