🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩
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🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹🔱 💠 भक्ति ⚜ सुधा 💠 🔱🌹
【 गत ब्लॉग से आगे 】
🌹 नामरूप की उपयोगिता :
तामस कर्म तथा विचार दूर करने के लिए राजस और राजसों के मिटाने के लिए सात्विक कर्म तथा ज्ञानों का आश्रयण किया जाता है। स्वाभिक या पाशविक कर्मों तथा ज्ञानों के मिटाने के लिए वेदशास्त्र-सम्मत कर्म और ज्ञानों का अवलम्बन करना आवश्यक होता है।
योगशास्त्र ने क्लिष्ठा वृत्तियों पर विजय प्राप्त करने के लिए अक्लिष्टा वृत्तियों का अवलम्बन करना बतलाया है। घोर मूढ़ वृत्तियाँ बिना शान्तवृत्तियों के सेवन के कभी भी दूर नहीं हो सकतीं। जब प्रपंचातीत परमतत्व से प्रच्युत होकर जीव व्यावहारिक जगत में अवतीर्ण होता है। तब उसके सामने विश्व के शुभ-अशुभ, न्याय-अन्याय, अनुकूल-प्रतिकूल अनेक प्रकार के विषय और व्यवहार उपस्थित होते हैं। भलाई-बुराई विष-अमृत आदि भेद जब मानने पड़ते हैं, क्षुधा-पिपासा मिटाने के लिए अन्न-जल की अपेक्षा होती है तब फिर पुण्य-पाप की व्यवस्था भी माननी पड़ती है। यहीं वर्णश्रमानुसार वेद शास़्त्रोक्त कर्म-धर्म की आवश्यकता होती है। बिना किसी निर्दोष सात्विक, आलम्बन के मन को निरालम्ब नहीं किया जा सकता।
वैदिकों का मत है कि नामरूप से अतीन वेदान्तवेद्य, परमतत्व हो स्वांशभूत प्राणियों के कल्याणार्थ अपनी अचिन्त्य दिव्य लीलाशक्ति से परम मनोहर नामरूप को स्वीकार करते हैं। जैसे कोई परमकारुणिक चिकित्सक किसी कुपथ्यप्रिय, अदीर्घ-दर्शी अबोध शिशु को उसके अभीष्ठ कुपथ्यरूप में दिव्य महौषध का प्रदान करता है, वैसे ही मनोहर शब्द, स्पर्श, रूप, रस गन्धादि विषयों में आसक्तचित प्राणियों के मन को प्रपंचातीत भगवान् के निजस्वरूप में आकर्षित करने के लिए ही अशब्द, अरूप, अस्पर्श, अव्यय का ही दिव्य शब्द, दिव्य स्पर्श, दिव्य गन्ध, दिव्य रूप सम्पन्न रूप में प्रादुर्भाव होता है। भक्तों के अभीष्ठ भिन्न स्वरूपों के विशिष्ट सौन्दर्य, माधुर्यादि लोकोक्तर गुणगणों में चित्त के आसक्त होने के अनन्तर वही अदृश्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य परमतत्व सुस्पष्ट रूप में व्यक्त हो जाता है। शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य, गणेश आदि वेदशास्त्र-समस्त सभी स्वरूपों में एक वही पूर्णत: व्यक्त होता है। इसीलिए उनके गाहात्म्य प्रतिपादक सभी सद्ग्रन्थों में अन्तिम स्वरूप एक ही मिलता है। एक अनन्त, अखण्ड निर्विशेष, स्वप्रकाश, सच्चिदानन्द ही सर्वाघार, साक्षीरूप से अविशिष्ट रहता है।
गीता में तो यहाँ तक कहा गया है कि विश्व में जो भी कोई ‘विभूतिमत् ऊज्र्जिततत्व’ दिखलाई देता हो, उसे भी भगवान का ही रूप समझना चाहिए। आचार्यप्रवर श्री विद्यारण्यजी ने ‘पंचदशी’ में कहा है कि परमेश्वर के भिन्न स्वरूपों में विवाद नहीं करना चाहिए। जब निखिल विश्व ही परमेश्वर का स्वरूप है, तब अमुक परमेश्वर है, अमुक नहीं, ऐसे विवाद का अवसर ही कहाँ? इसीलिए अश्वत्थ, वट, हल, कुदाल तक के पूजा अपने धर्म में होती है। सभी में पूर्णतम, परमतत्व का ही पारमार्थिक रूप उपलब्ध हो सकता है, फिर उसका नाम या रूप चाहे जो कुछ भी हो। इसीलिए नामविशेष पर आग्रह न करके अभिज्ञों ने ‘कस्मे-चिन्महसे नमः कस्मै देवाय हविषा विधेम’’ इस रूप से ही परमतत्व का वन्दन किया है। परन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि भगवान में नाम और रूप हैं ही नहीं।
【 शेष आगे के ब्लॉग में 】
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
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★ प्रिय भगवद्जन.... धार्मिक पोस्ट पाने या हमारे सत्संग में सामिल होने के लिए श्री "राधे राधे".... शेयर करें! आपके स्वास्थ्य व प्रसन्नता की मंगल कामना के साथ.."कृष्णा श्री राधाप्रेमी" : मोबाइल नम्बर ~ 9009290042
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तामस कर्म तथा विचार दूर करने के लिए राजस और राजसों के मिटाने के लिए सात्विक कर्म तथा ज्ञानों का आश्रयण किया जाता है। स्वाभिक या पाशविक कर्मों तथा ज्ञानों के मिटाने के लिए वेदशास्त्र-सम्मत कर्म और ज्ञानों का अवलम्बन करना आवश्यक होता है।
योगशास्त्र ने क्लिष्ठा वृत्तियों पर विजय प्राप्त करने के लिए अक्लिष्टा वृत्तियों का अवलम्बन करना बतलाया है। घोर मूढ़ वृत्तियाँ बिना शान्तवृत्तियों के सेवन के कभी भी दूर नहीं हो सकतीं। जब प्रपंचातीत परमतत्व से प्रच्युत होकर जीव व्यावहारिक जगत में अवतीर्ण होता है। तब उसके सामने विश्व के शुभ-अशुभ, न्याय-अन्याय, अनुकूल-प्रतिकूल अनेक प्रकार के विषय और व्यवहार उपस्थित होते हैं। भलाई-बुराई विष-अमृत आदि भेद जब मानने पड़ते हैं, क्षुधा-पिपासा मिटाने के लिए अन्न-जल की अपेक्षा होती है तब फिर पुण्य-पाप की व्यवस्था भी माननी पड़ती है। यहीं वर्णश्रमानुसार वेद शास़्त्रोक्त कर्म-धर्म की आवश्यकता होती है। बिना किसी निर्दोष सात्विक, आलम्बन के मन को निरालम्ब नहीं किया जा सकता।
वैदिकों का मत है कि नामरूप से अतीन वेदान्तवेद्य, परमतत्व हो स्वांशभूत प्राणियों के कल्याणार्थ अपनी अचिन्त्य दिव्य लीलाशक्ति से परम मनोहर नामरूप को स्वीकार करते हैं। जैसे कोई परमकारुणिक चिकित्सक किसी कुपथ्यप्रिय, अदीर्घ-दर्शी अबोध शिशु को उसके अभीष्ठ कुपथ्यरूप में दिव्य महौषध का प्रदान करता है, वैसे ही मनोहर शब्द, स्पर्श, रूप, रस गन्धादि विषयों में आसक्तचित प्राणियों के मन को प्रपंचातीत भगवान् के निजस्वरूप में आकर्षित करने के लिए ही अशब्द, अरूप, अस्पर्श, अव्यय का ही दिव्य शब्द, दिव्य स्पर्श, दिव्य गन्ध, दिव्य रूप सम्पन्न रूप में प्रादुर्भाव होता है। भक्तों के अभीष्ठ भिन्न स्वरूपों के विशिष्ट सौन्दर्य, माधुर्यादि लोकोक्तर गुणगणों में चित्त के आसक्त होने के अनन्तर वही अदृश्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य परमतत्व सुस्पष्ट रूप में व्यक्त हो जाता है। शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य, गणेश आदि वेदशास्त्र-समस्त सभी स्वरूपों में एक वही पूर्णत: व्यक्त होता है। इसीलिए उनके गाहात्म्य प्रतिपादक सभी सद्ग्रन्थों में अन्तिम स्वरूप एक ही मिलता है। एक अनन्त, अखण्ड निर्विशेष, स्वप्रकाश, सच्चिदानन्द ही सर्वाघार, साक्षीरूप से अविशिष्ट रहता है।
गीता में तो यहाँ तक कहा गया है कि विश्व में जो भी कोई ‘विभूतिमत् ऊज्र्जिततत्व’ दिखलाई देता हो, उसे भी भगवान का ही रूप समझना चाहिए। आचार्यप्रवर श्री विद्यारण्यजी ने ‘पंचदशी’ में कहा है कि परमेश्वर के भिन्न स्वरूपों में विवाद नहीं करना चाहिए। जब निखिल विश्व ही परमेश्वर का स्वरूप है, तब अमुक परमेश्वर है, अमुक नहीं, ऐसे विवाद का अवसर ही कहाँ? इसीलिए अश्वत्थ, वट, हल, कुदाल तक के पूजा अपने धर्म में होती है। सभी में पूर्णतम, परमतत्व का ही पारमार्थिक रूप उपलब्ध हो सकता है, फिर उसका नाम या रूप चाहे जो कुछ भी हो। इसीलिए नामविशेष पर आग्रह न करके अभिज्ञों ने ‘कस्मे-चिन्महसे नमः कस्मै देवाय हविषा विधेम’’ इस रूप से ही परमतत्व का वन्दन किया है। परन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि भगवान में नाम और रूप हैं ही नहीं।
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