🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩
※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹🔱 💠 भक्ति ⚜ सुधा 💠 🔱🌹
🌹भक्ति सुधा :
🌹नामरूप की उपयोगिता :
【 गत ब्लॉग से आगे 】
अतः जैसे रज से ही दर्पणगत रज दूर किया जाता है, कण्टक से ही कण्टक निकाला जाता है, किंवा विष से ही विष का प्रभाव दूर किया जाता है, वैसे ही कर्म से ही कर्म का निर्हार और नामरूप से नामरूपातीत तत्व प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है। निगुण, निराकार, निष्प्रपंच, असंग से ही सगुण, साकार, समस्त, प्रपंच व्यक्त हुआ है। इसमें ही आबद्ध जन्तु अपने मूल परमतत्व से बहिर्मुख होकर अनादिकाल से इस दुर्गम भवाटवी में भटक रहे हैं।
कहा जाता है कि मन, बुद्धि के हलचल से ही परमार्थ परमतत्व आवृत हो जाता है। जैसे छाया के पीछे चलने से वह पकड़कर स्थिर नहीं की जा सकती, वैसे ही मन बुद्धि को स्थिर करने के प्रयत्न से वे वश में नहीं किये जा सकते। मन में निर्विचारता या निर्व्यापारता स्थिर होने पर ही निर्दश्य, निर्विकल्प वस्तु का बोध या उपलम्भ होता है। मन के व्यापार से ही दृश्य या विकल्प की उपस्थिति होती है। मन के निर्व्यापारता या अमनीभाव में विकल्प प्रतीतिविरूद्ध होने से निर्विकल्प वस्तु का अनायास ही स्फुरण होता है। परन्तु यह क्या जैसा कहने में सुगम है, वैसे ही अनुष्ठान में भी? क्या महाप्रयास बिना एक क्षण के लिए भी ऐसा सम्भव है कि मन निश्चल रहे और उसमें आवश्यक-अनावश्यक अन्धकार, प्रकाश, आकाश, तृण, कोई-न-कोई दृश्य स्फुरित न हो ! जब ऐसा सम्भव ही नहीं, तब अनिर्देश्य, अनाम, अरूप, निष्क्रिय, वस्तु कोरी बातों से क्या लाभ?
यह कह देना बहुत सरल है कि स्वयं विज्ञाता या मन्ता का विचार ही मनन करने-न करने में स्वतन्त्र है। कर्ता चाहे तो करणों को व्यापृत करें न करे, उनसे काम ले अथवा न लें। परन्तु क्या मन मन्ता की रुचि का अनुवर्त्तन करता है अथवा मन्ता की रुचि न होते हुए भी उसको ह्ठात आकर्षित करता है? इसीलिए विवेकियों ने अघ्यारोप और अपवाद से निष्प्रपंच का ही प्रपंच किया है। जब प्रपंच एव तदन्तर्गत नामरूप क्रियाओं के आलम्बन द्वारा ही सर्वातीत तत्व को प्राप्त करना है, तब फिर उसमें उल्वण भावों को सोच-समझकर उनको त्यागने के लिए पहले शान्तभावों का आलम्बन करना पड़ता है।
【 शेष आगे के ब्लॉग में 】
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
★ प्रिय भगवद्जन.... धार्मिक पोस्ट पाने या हमारे सत्संग में सामिल होने के लिए श्री "राधे राधे".... शेयर करें! आपके स्वास्थ्य व प्रसन्नता की मंगल कामना के साथ.."कृष्णा श्री राधाप्रेमी" : मोबाइल नम्बर ~ 9009290042
※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹🔱 💠 भक्ति ⚜ सुधा 💠 🔱🌹
🌹भक्ति सुधा :
🌹नामरूप की उपयोगिता :
【 गत ब्लॉग से आगे 】
अतः जैसे रज से ही दर्पणगत रज दूर किया जाता है, कण्टक से ही कण्टक निकाला जाता है, किंवा विष से ही विष का प्रभाव दूर किया जाता है, वैसे ही कर्म से ही कर्म का निर्हार और नामरूप से नामरूपातीत तत्व प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है। निगुण, निराकार, निष्प्रपंच, असंग से ही सगुण, साकार, समस्त, प्रपंच व्यक्त हुआ है। इसमें ही आबद्ध जन्तु अपने मूल परमतत्व से बहिर्मुख होकर अनादिकाल से इस दुर्गम भवाटवी में भटक रहे हैं।
कहा जाता है कि मन, बुद्धि के हलचल से ही परमार्थ परमतत्व आवृत हो जाता है। जैसे छाया के पीछे चलने से वह पकड़कर स्थिर नहीं की जा सकती, वैसे ही मन बुद्धि को स्थिर करने के प्रयत्न से वे वश में नहीं किये जा सकते। मन में निर्विचारता या निर्व्यापारता स्थिर होने पर ही निर्दश्य, निर्विकल्प वस्तु का बोध या उपलम्भ होता है। मन के व्यापार से ही दृश्य या विकल्प की उपस्थिति होती है। मन के निर्व्यापारता या अमनीभाव में विकल्प प्रतीतिविरूद्ध होने से निर्विकल्प वस्तु का अनायास ही स्फुरण होता है। परन्तु यह क्या जैसा कहने में सुगम है, वैसे ही अनुष्ठान में भी? क्या महाप्रयास बिना एक क्षण के लिए भी ऐसा सम्भव है कि मन निश्चल रहे और उसमें आवश्यक-अनावश्यक अन्धकार, प्रकाश, आकाश, तृण, कोई-न-कोई दृश्य स्फुरित न हो ! जब ऐसा सम्भव ही नहीं, तब अनिर्देश्य, अनाम, अरूप, निष्क्रिय, वस्तु कोरी बातों से क्या लाभ?
यह कह देना बहुत सरल है कि स्वयं विज्ञाता या मन्ता का विचार ही मनन करने-न करने में स्वतन्त्र है। कर्ता चाहे तो करणों को व्यापृत करें न करे, उनसे काम ले अथवा न लें। परन्तु क्या मन मन्ता की रुचि का अनुवर्त्तन करता है अथवा मन्ता की रुचि न होते हुए भी उसको ह्ठात आकर्षित करता है? इसीलिए विवेकियों ने अघ्यारोप और अपवाद से निष्प्रपंच का ही प्रपंच किया है। जब प्रपंच एव तदन्तर्गत नामरूप क्रियाओं के आलम्बन द्वारा ही सर्वातीत तत्व को प्राप्त करना है, तब फिर उसमें उल्वण भावों को सोच-समझकर उनको त्यागने के लिए पहले शान्तभावों का आलम्बन करना पड़ता है।
【 शेष आगे के ब्लॉग में 】
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
★ प्रिय भगवद्जन.... धार्मिक पोस्ट पाने या हमारे सत्संग में सामिल होने के लिए श्री "राधे राधे".... शेयर करें! आपके स्वास्थ्य व प्रसन्नता की मंगल कामना के साथ.."कृष्णा श्री राधाप्रेमी" : मोबाइल नम्बर ~ 9009290042
※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें