🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩
※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹🔱 💠 भक्ति ⚜ सुधा 💠 🔱🌹
【 गत ब्लॉग से आगे 】
🌹 इष्टदेव की उपासना :
ऐसे ही यह भी प्रश्न होता है कि भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों में भिन्न-भिन्न प्रकार के आचार और व्यवहार प्रचलित हैं। उन-उन सम्प्रदायों में कहा यह जाता है कि बिना इन आचारों के प्राणी का कल्याण हो ही नहीं सकता। चाहे कितना भी वैदिक शुद्ध ब्राह्मण क्यों न हो, परन्तु इन आचारों के बिना उसके हाथ से जल भी आग्रह्य है। ऐसे ही दूसरे साम्प्रदायिक अपने आचारों के विषय में भी उपर्युक्त बात ही कहते हैं। जिस आचार से एक सम्प्रदाय परम कल्याण कहता है, उसी आचार से दूसरा सम्प्रदाय वृथा बतलाता है। एक वैसे आचारविहीन के दर्शन से प्रायश्चित बतलाते हैं तो दूसरे उसी आचारयुक्त वाले के ही दर्शन से प्रायश्चित बतलाता हैं। इसका यही उत्तर देना ठीक है कि जिसके सम्प्रदाय में जो आचार प्रचलित है।, उसी के लिए उक्त उपदेश ठीक है और जिसके पितृ–पितामहादि में जो आचार नहीं हैं, उन्हें नहीं ग्रहण करना चाहिए।
विवाद का मूल यही है कि लोग दूसरे सम्प्रदाय तथा आचार्यों की निन्दा करके अपने सम्प्रदाय के आचारों एवं सिद्धान्तों को स्वीकार करना चाहते हैं और जब वैसा ही दूसरे लोग करते हैं, तब फिर क्षुब्ध होते हैं। वे
‘‘आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ! सुखं वा यदि वा दुःखम्’’
भगवान के इन भावों को भूल जाते है। लोगो को इस बात पर अवश्य ध्यान देना चाहिए कि जैसे कोई हमारे साम्प्रदायिक व्यक्ति को अपने सम्प्रदाय में मिलाता है तो हमें क्षोभ होता है, वैसे ही यदि हम भी दूसरे सम्प्रदाय के व्यक्ति को अपने में मिलायेगें तो अन्य लोगो को भी वैसे ही क्षोभ होगा। परन्तु प्रायः देखते-देखते कितने स्मार्त भिन्न सम्प्रदायों में मिला लिये जाते हैं। साथ ही कहीं-कहीं कोई सम्प्रदायिक भी स्मार्त्त बना लिये जाते हैं। यही राग-द्वेष का मूल इतना बद्धमूल हो गया है कि हिन्दु-मुसलमानों से भी कहीं अधिक घनिष्ठ संघर्ष साम्प्रदायिको में दृष्टिगोचर होता है।
वेदान्त-वेद्य, पूर्ण परब्रह्म भगवान ही सकल सच्छास्त्रों के महातात्पर्य के विषय हैं और यही वर्णाश्रमानुसार सर्व कर्म-धर्म से समर्हणीय हैं। इनका अपरोक्ष साक्षात्कार ही जीवन का चरम फल है। परन्तु प्रथम से ही प्राणियों का मन इन परम-दुरवगाह्य भगवान के मनोवचनातीत स्वरूप में प्रवेश नहीं कर सकता। अतः परम करुण प्रभु भक्तानुग्रहार्थ ही अपने अनेक प्रकार के मंगलमय स्वरूप को धारण करते हैं। उपनिषदों में दहर-विद्या, शाण्डिल्य-विद्या, वैश्वानर-विद्याओं के रूप में इनकी ही अनके सगुण उपासनाएँ विस्तीर्ण हैं। यही भगवान विघ्नराज श्रीगणेश के रूप में ऋद्धि–सिद्धि आदि निज शक्तियों सहित आराधित होकर भक्तों का सर्वविघ्न–निवारण, सर्व-अभीष्ठ-सम्पादनपूर्वक स्व-स्वरूप साक्षात्कार कराकर परम गति देते है और यही विश्वचक्षु भगवान भास्कर के रूप में उपास्य होकर सर्व-राग-निवारणपूर्वक अपने परमार्थिक विशुद्ध ब्रह्मस्वरूप का साक्षात्कार कराकर भव-रोग से मुक्त कर देते हैं।
【 शेष आगे के ब्लॉग में 】
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
★ प्रिय भगवद्जन.... धार्मिक पोस्ट पाने या हमारे सत्संग में सामिल होने के लिए श्री "राधे राधे".... शेयर करें! आपके स्वास्थ्य व प्रसन्नता की मंगल कामना के साथ.."कृष्णा श्री राधाप्रेमी" : मोबाइल नम्बर ~ 9009290042
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ऐसे ही यह भी प्रश्न होता है कि भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों में भिन्न-भिन्न प्रकार के आचार और व्यवहार प्रचलित हैं। उन-उन सम्प्रदायों में कहा यह जाता है कि बिना इन आचारों के प्राणी का कल्याण हो ही नहीं सकता। चाहे कितना भी वैदिक शुद्ध ब्राह्मण क्यों न हो, परन्तु इन आचारों के बिना उसके हाथ से जल भी आग्रह्य है। ऐसे ही दूसरे साम्प्रदायिक अपने आचारों के विषय में भी उपर्युक्त बात ही कहते हैं। जिस आचार से एक सम्प्रदाय परम कल्याण कहता है, उसी आचार से दूसरा सम्प्रदाय वृथा बतलाता है। एक वैसे आचारविहीन के दर्शन से प्रायश्चित बतलाते हैं तो दूसरे उसी आचारयुक्त वाले के ही दर्शन से प्रायश्चित बतलाता हैं। इसका यही उत्तर देना ठीक है कि जिसके सम्प्रदाय में जो आचार प्रचलित है।, उसी के लिए उक्त उपदेश ठीक है और जिसके पितृ–पितामहादि में जो आचार नहीं हैं, उन्हें नहीं ग्रहण करना चाहिए।
विवाद का मूल यही है कि लोग दूसरे सम्प्रदाय तथा आचार्यों की निन्दा करके अपने सम्प्रदाय के आचारों एवं सिद्धान्तों को स्वीकार करना चाहते हैं और जब वैसा ही दूसरे लोग करते हैं, तब फिर क्षुब्ध होते हैं। वे
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भगवान के इन भावों को भूल जाते है। लोगो को इस बात पर अवश्य ध्यान देना चाहिए कि जैसे कोई हमारे साम्प्रदायिक व्यक्ति को अपने सम्प्रदाय में मिलाता है तो हमें क्षोभ होता है, वैसे ही यदि हम भी दूसरे सम्प्रदाय के व्यक्ति को अपने में मिलायेगें तो अन्य लोगो को भी वैसे ही क्षोभ होगा। परन्तु प्रायः देखते-देखते कितने स्मार्त भिन्न सम्प्रदायों में मिला लिये जाते हैं। साथ ही कहीं-कहीं कोई सम्प्रदायिक भी स्मार्त्त बना लिये जाते हैं। यही राग-द्वेष का मूल इतना बद्धमूल हो गया है कि हिन्दु-मुसलमानों से भी कहीं अधिक घनिष्ठ संघर्ष साम्प्रदायिको में दृष्टिगोचर होता है।
वेदान्त-वेद्य, पूर्ण परब्रह्म भगवान ही सकल सच्छास्त्रों के महातात्पर्य के विषय हैं और यही वर्णाश्रमानुसार सर्व कर्म-धर्म से समर्हणीय हैं। इनका अपरोक्ष साक्षात्कार ही जीवन का चरम फल है। परन्तु प्रथम से ही प्राणियों का मन इन परम-दुरवगाह्य भगवान के मनोवचनातीत स्वरूप में प्रवेश नहीं कर सकता। अतः परम करुण प्रभु भक्तानुग्रहार्थ ही अपने अनेक प्रकार के मंगलमय स्वरूप को धारण करते हैं। उपनिषदों में दहर-विद्या, शाण्डिल्य-विद्या, वैश्वानर-विद्याओं के रूप में इनकी ही अनके सगुण उपासनाएँ विस्तीर्ण हैं। यही भगवान विघ्नराज श्रीगणेश के रूप में ऋद्धि–सिद्धि आदि निज शक्तियों सहित आराधित होकर भक्तों का सर्वविघ्न–निवारण, सर्व-अभीष्ठ-सम्पादनपूर्वक स्व-स्वरूप साक्षात्कार कराकर परम गति देते है और यही विश्वचक्षु भगवान भास्कर के रूप में उपास्य होकर सर्व-राग-निवारणपूर्वक अपने परमार्थिक विशुद्ध ब्रह्मस्वरूप का साक्षात्कार कराकर भव-रोग से मुक्त कर देते हैं।
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