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🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹🔱 💠 भक्ति ⚜ सुधा 💠 🔱🌹
【 गत ब्लॉग से आगे 】
🌟 सगुणोपासना में सरलता :
श्रीकृष्ण चन्द्र परमानन्दकन्द भगवान से अर्जुन ने प्रश्न किया कि जो भक्त आपकी परमश्रद्धा सहित उपासना करते हैं और जो अव्यक्त अक्षर की उपासना करते हैं इन दोनों में कौन अतिशय रूप् से आत्यन्तिक पुरुषार्थप्राप्ति के उपाय को जाननेवाले है?-
‘‘एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तास्तेषां के योगवित्तमाः।।’’
प्रश्न का आशय यह है कि ‘गीता’ में द्वितीय अध्याय से लेकर दशम अध्याय पर्यन्त भगवान ने भिन्न-भिन्न स्थलों में- सर्वोपाधिविनिर्मुक्त, निराकार, निर्विकार, सर्वेन्द्रियाद्यगोचर ब्रह्म की एवं सर्वैश्वर्यसर्वज्ञानशक्त्यादिसम्पन्न विशुद्ध सत्वमय सगुण भगवान की उपासना का वर्णन किया है।
विशेषतः विश्वरूपाष्ध्याय में भगवान ने सगुण परमेश्वर के अचिन्त्य, अद्भूत, लोकोत्तरचमत्कारकारी स्वरूप का दर्शन भी कराया और अन्त में ‘‘मत्कर्मकृत्’’ इस वचन से यह कहा कि-
‘मेरे लिये श्रौतस्मार्तकर्म करता हुआ, मुझे ही ध्येय, ज्ञेय परमाराध्य समझता हुआ मेरी भक्ति करे और सर्वभूतों में वैरभावविवर्जित हो, तो प्राणी मुझे प्राप्त कर लेता है।’’
ऐसी स्थिति मे यह सन्देह होना स्वाभाविक है कि दोनों उपासनाओं में कौन श्रेष्ठ है? ‘एवं’ शब्द से अव्यवहित पूर्वोक्त प्रकार का परामर्श होता है। यद्यपि अव्यवहित पूर्व ग्यारहवें अध्याय में विश्वरूप का वर्णन है, तथापि यहाँ सविशेष स्वरूपमात्र की उपासना का प्रश्न समझना चाहिये। अर्थात जो कोई भगवान के अचिन्त्यानन्त कल्याणगुणगणार्णव विश्वरूप एवं श्रीमन्नारायण, श्रीसदाशिव अथवा श्रीकृष्ण चन्द्र परमानन्दकन्द श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्र की उपासना में निरत है और जो भगवान निर्विशेष में निस्वरूप में निरत है, इन दानों में कौन श्रेष्ठ है?
तब श्रीभगवान ने कहा-जो महानुभाव मुझे सगुणस्वरूप में मन लगाकर परमश्रद्धा से उपासना करते हैं वे मेरे मत में अत्यन्त श्रेष्ट हैं-
‘‘मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते में युक्ततमा मताः।।’’
तब क्या निर्गुण स्वरूप् में परिनिष्ठित श्रेष्ठ नहीं हैं?
【 शेष आगे के ब्लॉग में 】
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🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
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🌹: कृष्णा श्री राधाप्रेमी : 🌹
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श्रीकृष्ण चन्द्र परमानन्दकन्द भगवान से अर्जुन ने प्रश्न किया कि जो भक्त आपकी परमश्रद्धा सहित उपासना करते हैं और जो अव्यक्त अक्षर की उपासना करते हैं इन दोनों में कौन अतिशय रूप् से आत्यन्तिक पुरुषार्थप्राप्ति के उपाय को जाननेवाले है?-
‘‘एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तास्तेषां के योगवित्तमाः।।’’
प्रश्न का आशय यह है कि ‘गीता’ में द्वितीय अध्याय से लेकर दशम अध्याय पर्यन्त भगवान ने भिन्न-भिन्न स्थलों में- सर्वोपाधिविनिर्मुक्त, निराकार, निर्विकार, सर्वेन्द्रियाद्यगोचर ब्रह्म की एवं सर्वैश्वर्यसर्वज्ञानशक्त्यादिसम्पन्न विशुद्ध सत्वमय सगुण भगवान की उपासना का वर्णन किया है।
विशेषतः विश्वरूपाष्ध्याय में भगवान ने सगुण परमेश्वर के अचिन्त्य, अद्भूत, लोकोत्तरचमत्कारकारी स्वरूप का दर्शन भी कराया और अन्त में ‘‘मत्कर्मकृत्’’ इस वचन से यह कहा कि-
‘मेरे लिये श्रौतस्मार्तकर्म करता हुआ, मुझे ही ध्येय, ज्ञेय परमाराध्य समझता हुआ मेरी भक्ति करे और सर्वभूतों में वैरभावविवर्जित हो, तो प्राणी मुझे प्राप्त कर लेता है।’’
ऐसी स्थिति मे यह सन्देह होना स्वाभाविक है कि दोनों उपासनाओं में कौन श्रेष्ठ है? ‘एवं’ शब्द से अव्यवहित पूर्वोक्त प्रकार का परामर्श होता है। यद्यपि अव्यवहित पूर्व ग्यारहवें अध्याय में विश्वरूप का वर्णन है, तथापि यहाँ सविशेष स्वरूपमात्र की उपासना का प्रश्न समझना चाहिये। अर्थात जो कोई भगवान के अचिन्त्यानन्त कल्याणगुणगणार्णव विश्वरूप एवं श्रीमन्नारायण, श्रीसदाशिव अथवा श्रीकृष्ण चन्द्र परमानन्दकन्द श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्र की उपासना में निरत है और जो भगवान निर्विशेष में निस्वरूप में निरत है, इन दानों में कौन श्रेष्ठ है?
तब श्रीभगवान ने कहा-जो महानुभाव मुझे सगुणस्वरूप में मन लगाकर परमश्रद्धा से उपासना करते हैं वे मेरे मत में अत्यन्त श्रेष्ट हैं-
‘‘मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
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तब क्या निर्गुण स्वरूप् में परिनिष्ठित श्रेष्ठ नहीं हैं?
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