🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩
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🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹🔱 💠 भक्ति ⚜ सुधा 💠 🔱🌹
【 गत ब्लॉग से आगे 】
🌟 सगुणोपासना में सरलता :
वस्तुतः किसी भी वस्तु में चित्त को एकाग्र करने से मूल परमात्मपद ही की प्राप्ति होती है। जैसे स्फटिक मे लालपुष्प् के सम्बन्ध से ‘रक्तःस्फटिकः’ (लाल स्फटिक है) ऐसी बुद्धि होती है, उसी में यदि किसी को ‘स्फटिक है’ ऐसा ज्ञान प्रमुख हो जाता है तो उसे उसमें पराग मणि की बुद्धि होती है। आगे चलकर चन्द्र की चाँदनी आदि के संसर्ग से उसी में इन्द्रनील की बुद्धि होने लगती है। फिर भी इन सभी बुद्धियों का आलम्बन एक स्वच्छ स्फटिक ही है। वैसे ही एक शुद्ध ब्रह्मतत्व ही माया के सम्बन्ध से अव्यक्त ब्रह्म और सूक्ष्म प्रपंच उपाधि से उपहित होने पर हिरण्य-गर्भ एवं स्थूल प्रपंच से उपहित होकर वही विराट् कहलाता है। जैसे स्वच्छ स्फटिक में इन्द्रनील बुद्धि से दृढ़ चिन्तन द्वारा इन्द्रनील बुद्धि मिटकर पराग बुद्धि होगी।
यह दृढ़ चिन्तन की महिमा है कि वह चिन्तनीय वस्तु का यथार्थ स्वरूप अवगत करा देता है। अतः पराग का चिन्तन रक्त स्फटिक का बोध करा देगा। पुनश्च उसके चिन्तन से अन्त में अवश्य ही ‘शुद्धः स्फटिकः’ ऐसा बोध हो जाता है। वैसे ही स्थूल का चिन्तन करते-करते सूक्ष्म का और फिर उसका चिनतन करते-करते कारण का, फिर कार्यकारणातीत शुद्ध ब्रह्म का बोध (साक्षात्कार) होता है। शुद्ध मन तो ऐसी सुन्दर उपाधि है जहाँ ‘स्वच्छः स्फटिकः’ के समान शुद्ध ब्रह्म का बोध होता है।
अन्य मूर्तियों के चिन्तन में चिन्तनीय पदार्थ पृथक होता है, मन चिन्तन-व्यापार में ही लगा रहता है। परन्तु, यहाँ तो मन ही ध्येय भगवान की मूर्तिरूप से भी व्यक्त होता है और वही चिन्तन करने वाला होता है। मानस जप में भी यही हाल है, वहाँ मन को ही मानस मन्त्र बनना पड़ता है। इस मानस जप और ध्यान से मन की शुद्धि, एकाग्रता, भगवान के वास्तविक स्वरूप की प्रप्ति वड़ी ही सुविधा के साथ हो जाती है।
【 शेष आगे के ब्लॉग में 】
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹: कृष्णा श्री राधाप्रेमी : 🌹
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यह दृढ़ चिन्तन की महिमा है कि वह चिन्तनीय वस्तु का यथार्थ स्वरूप अवगत करा देता है। अतः पराग का चिन्तन रक्त स्फटिक का बोध करा देगा। पुनश्च उसके चिन्तन से अन्त में अवश्य ही ‘शुद्धः स्फटिकः’ ऐसा बोध हो जाता है। वैसे ही स्थूल का चिन्तन करते-करते सूक्ष्म का और फिर उसका चिनतन करते-करते कारण का, फिर कार्यकारणातीत शुद्ध ब्रह्म का बोध (साक्षात्कार) होता है। शुद्ध मन तो ऐसी सुन्दर उपाधि है जहाँ ‘स्वच्छः स्फटिकः’ के समान शुद्ध ब्रह्म का बोध होता है।
अन्य मूर्तियों के चिन्तन में चिन्तनीय पदार्थ पृथक होता है, मन चिन्तन-व्यापार में ही लगा रहता है। परन्तु, यहाँ तो मन ही ध्येय भगवान की मूर्तिरूप से भी व्यक्त होता है और वही चिन्तन करने वाला होता है। मानस जप में भी यही हाल है, वहाँ मन को ही मानस मन्त्र बनना पड़ता है। इस मानस जप और ध्यान से मन की शुद्धि, एकाग्रता, भगवान के वास्तविक स्वरूप की प्रप्ति वड़ी ही सुविधा के साथ हो जाती है।
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