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  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
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  🌹🔱 💠 भक्ति ⚜ सुधा 💠 🔱🌹

【 गत ब्लॉग से आगे 】

 🌟 संकल्पबल :

सुख में क्षण वर्ष भर लगते हैं, दुःखक्षण भी वर्ष से लगते हैं। गोपांगनाओ को गोविनद-दर्शन में युग भी क्षण से प्रतीत होते थे, गोविन्द के विप्रयोग में क्षण भी सहस्त्रों युग-सा प्रतीत होता था-

‘‘गोपीनां परमानन्द आसीद्गोविन्ददर्शने।
क्षणं युगशतमिव यासां येन विना भवत्।।’’

सारांश यह है कि मन ही संसार है। अतः जैसे वटबीज के भीतर अंकुरनाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र-पल्लव, फलात्मक सम्पूर्ण वृक्ष रहता है और उसमें अपरिगणित फल होते हैं, इसी तरह एक वटबीज के भीतर अनन्त वट वृक्ष रहते हैं यह कहना भी अत्युक्ति नहीं है। अपितु-

‘‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।’’

इस उक्ति के अनुसार ठीक ही है। इसी तरह मन के भीतर संसार है। गृह-छिद्र से आने वाली सूर्य-किरणों में दिखाई देनेवाले सूक्ष्मरजों का आठवाँ या छठा हिस्सा परमणु है, उसका पाँचवाँ हिस्सा स्पर्शतन्मात्रा, उसके स्वल्पांश में प्राण और प्राण के सहारे रहने वाले मन मे ब्रह्माण्ड रहता है। ब्रह्माण्ड में अनन्त मन रहते है, उनमें भी ब्रह्माण्ड रहता है। इस तरह एक परमाणु के भीतर भी अनन्त ब्रह्माण्ड का होना सम्भव है।

इस दृष्टि से देखें तो भगवान् श्रीकृष्ण के संकल्प से परिमित वृन्दावन-धाम में अनन्त कोटि व्रजांगनाओं का विहार-स्थान होना और एक प्रहर चतुष्टयवती रात्रि में अनन्तकोटि ब्राह्मी रात्रियों का प्रवेश करके विहार करना आदि सब संभव ही प्रतीत होता है। है संकल्प के बल से स्वल्प देश में महादेश, स्वल्प काल में महाकाल का प्रवेश संभव है। किंचित् विचार करें तो मालूम होगा कि सूक्ष्मसंकल्प या विचार से ही स्थूलजगत् बन जाता है, अर्थात् मनोमय जगत् ही स्थूल प्रपंच होकर भासित होने लगता है। जैसे सूर्य के किरणों में रहने वाला अति सूक्ष्म जल ही कठोर बर्फ वन जाता है, वैसे अति सूक्ष्म संकल्प ही कठोर जगत् बन जाता है। सूर्य-किरणों में जल रहता है, परन्तु वह अति सूक्ष्म होता है, अतएव, वह दर्शन, गमन आदि में बाधक नहीं होता।

【 शेष आगे के ब्लॉग में 】

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 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
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