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【 गत ब्लॉग से आगे 】

🌟 सगुणोपासना में सरलता :

 इस आशंका का समाधान करते हुए भगवान् कहते हैं कि अव्यक्त, निर्गुण ब्रह्म में निरतचित्त पुरुषों को क्लेश अधिकतर होता है, क्योंकि देहधारियों में देहाभिमानियों को अव्यक्त गति निर्गुणप्राप्ति- सम्पादन करनी बहुत कठिन है-

‘‘क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।
अव्यक्ता हि गतिदुःखं देहवद्भिखाप्यते।।’’

यहाँ यह कहा जा सकता है कि जब श्रुतियों मे निर्विशेष ब्रह्म की उपासना से अविद्या, तत्कार्यत्मकप्रपंचनिवृत्ति तथा परमानन्दप्राप्तिरूप मोक्ष सद्यः श्रुत है एवं सविशेष ब्रह्म की उपासना से ब्रह्मलोक की प्राप्ति कही गयी है, जिससे कालान्तर में कैवल्य प्राप्त होता है, तब निर्विशेष ब्रह्म की उपासना से सविशेष सगुण-ब्रह्म की उपासना का उत्कृष्टत्व कैसे कहा जा सकता है?

यद्यपि यह ठीक है कि अदृश्य अग्राह्य, अचिन्त्य, निराकार, निर्विकार, प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्म परमात्मा की उपासना से प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्म का साक्षात्कार होने से मूलाविद्या की निवृत्ति होती है और अविद्या, तत्कार्यात्मक प्रपंच की निवृत्ति होते ही अनावृत् परमानन्दघन ब्रह्मात्मानाऽवस्थानरूप सद्योमुक्ति प्राप्त हो जाती है और सगुण ब्रह्म की उपासना से ब्रह्मलोक की प्राप्ति एवं कल्पान्त में ब्रह्मा के साथ कैवल्य मुक्ति प्राप्त होती है, अतः सगुणोपासना की अपेक्षा फलदृष्टि से निर्गुणोपासना का ही महत्व है, तथापि निर्गुणोपासना में कठिनाई अधिक है, सगुणोपासना में सरलता हैं-

‘‘क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम्।’’

यदि कहा जाय कि निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति उत्कृष्टा है, अतः उसमें अधिकतर क्लेश होना उसकी निकृष्टता का हेतु नहीं है, क्योंकि उत्कृष्ट फलप्राप्ति में अधिकतर क्लेश होता ही है, तो यह ठीक नहीं, क्योंकि सगुण-उपासना से भी उसी फल की प्राप्ति होती है, जिसकी निर्गुणोपसना से। इसका कारण यह है कि भगवत्कृपा से भगवत्स्वरूप साक्षात्कार द्वारा उसी निर्गुणोपासक प्राप्य कैवल्यपद की प्राप्ति हो जाती है-
मनोवचनातीत, अनिदमात्मक, अनिर्देश्य ब्रह्म का प्राणिबुद्धि में आरोहण ही अतिकठिन होता है।

【 शेष आगे के ब्लॉग में 】

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