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🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹🔱 💠 भक्ति ⚜ सुधा 💠 🔱🌹
【 गत ब्लॉग से आगे 】
🌟 सगुणोपासना में सरलता :
नामरूपक्रियात्क दृष्यप्रतीति के निराकरण के बिना निर्दृश्य दृक् का अभिव्यंजन होना अशक्य है। क्योंकि जैसे चन्द्रमा के अवस्थाविशेष विशिष्टस्वरूप पर ही राहु का प्राकट्य होता है, अन्यथा नहीं, वैसे ही दृश्याकार परिणामविवर्जित रजस्तमोऽननुविद्ध विशुद्धचित्तसत्व पर ही- प्रत्यक्चैत-न्याभिन्न निर्विशेष ब्रह्म का साक्षात्कर होता है। चित्त की तादृशी अवस्था संम्पत्ति देहाभिमानियों के लिये अत्यन्त दुःशक है। इसके विपरीत सगुणोपासना में सरलता है। यद्यपि बाह्य विषयों से गनःप्रत्यावर्तनपूर्वक भगवत्स्वरूप में मनोयोग करना कठिन ही है, तथापि निर्गुण, निर्विशेष में मनोयोग उससे भी कठिन है। उसकी अपेक्षा सगुण में मन का आकषर्ण होना सरल है। भगवान की मंगलमयी मनोरंजक लीलाएँ मुक्त, मुमुक्षु, विषयी आदि सब तरह के अधिकारियों के चित्त को खींचने वाली होती है।
जनसाधारण, वे चाहे ज्ञान, तत्साधनविहीन भी क्यों न हो, उनके कल्याणार्थ निर्गुण, निराकार, निर्विकार, शद्ध, सच्चिदानन्दघन परब्रह्म सगुण, साकार रूप में प्रकट होता है-
‘‘नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्र्भिगवतो नृप !
अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः।।’’
राम, कृष्ण, विष्णु, शिव की उपासना शुद्ध ब्रह्म की ही उपासना है। बुद्धि कुछ भी हो, किन्तु जिस वस्तु की उपासना होती है, उसी की प्राप्ति होती है। जैसे दीपक बुद्धि से भी यदि चिन्तामणि में प्रवृत्त हुआ जाय, तो भी प्राप्ति चिन्तामणि की ही होती है, वैसे ही चाहे जिस बुद्धि से भगवान की उपासना हो, प्राप्ति उस परमात्मा की ही होती है।
सच्चिदानन्द परब्रह्म आकाशादि समस्त प्रपंच का कारण है और सर्वत्र विराजमान है। विशेषतः बुद्धिरूपा गुहा या हृद्याकाश में उसका विशेष रूप से उपलभ्भ होता है। जैसे चन्द्र के सम्बन्ध से राहु का दर्शन होता है, वैसे ही शुद्ध बुद्धि के सम्बन्ध से परमात्मपद का दर्शन होता है। भावना-भावित भगवान की सगुण मूर्ति की वास्तविक दिव्य मूर्तिरूप में व्यक्त होती है। भगवान सर्वत्र होते हुए भी मायाजवनिका (पर्दे) से ढके हैं। उसे हटाकर वे जहाँ से चाहें वहाँ से व्यक्त हो सकते हैं। पाषाण से भी मायाजवनिका को हटाकर भगवान प्रह्लाद के लिये प्रकट हो सकते हैं, तब फिर शुद्ध बुद्धी ही तो भगवान के उपलम्भ का साधन है।
【 शेष आगे के ब्लॉग में 】
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🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
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🌹: कृष्णा श्री राधाप्रेमी : 🌹
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नामरूपक्रियात्क दृष्यप्रतीति के निराकरण के बिना निर्दृश्य दृक् का अभिव्यंजन होना अशक्य है। क्योंकि जैसे चन्द्रमा के अवस्थाविशेष विशिष्टस्वरूप पर ही राहु का प्राकट्य होता है, अन्यथा नहीं, वैसे ही दृश्याकार परिणामविवर्जित रजस्तमोऽननुविद्ध विशुद्धचित्तसत्व पर ही- प्रत्यक्चैत-न्याभिन्न निर्विशेष ब्रह्म का साक्षात्कर होता है। चित्त की तादृशी अवस्था संम्पत्ति देहाभिमानियों के लिये अत्यन्त दुःशक है। इसके विपरीत सगुणोपासना में सरलता है। यद्यपि बाह्य विषयों से गनःप्रत्यावर्तनपूर्वक भगवत्स्वरूप में मनोयोग करना कठिन ही है, तथापि निर्गुण, निर्विशेष में मनोयोग उससे भी कठिन है। उसकी अपेक्षा सगुण में मन का आकषर्ण होना सरल है। भगवान की मंगलमयी मनोरंजक लीलाएँ मुक्त, मुमुक्षु, विषयी आदि सब तरह के अधिकारियों के चित्त को खींचने वाली होती है।
जनसाधारण, वे चाहे ज्ञान, तत्साधनविहीन भी क्यों न हो, उनके कल्याणार्थ निर्गुण, निराकार, निर्विकार, शद्ध, सच्चिदानन्दघन परब्रह्म सगुण, साकार रूप में प्रकट होता है-
‘‘नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्र्भिगवतो नृप !
अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः।।’’
राम, कृष्ण, विष्णु, शिव की उपासना शुद्ध ब्रह्म की ही उपासना है। बुद्धि कुछ भी हो, किन्तु जिस वस्तु की उपासना होती है, उसी की प्राप्ति होती है। जैसे दीपक बुद्धि से भी यदि चिन्तामणि में प्रवृत्त हुआ जाय, तो भी प्राप्ति चिन्तामणि की ही होती है, वैसे ही चाहे जिस बुद्धि से भगवान की उपासना हो, प्राप्ति उस परमात्मा की ही होती है।
सच्चिदानन्द परब्रह्म आकाशादि समस्त प्रपंच का कारण है और सर्वत्र विराजमान है। विशेषतः बुद्धिरूपा गुहा या हृद्याकाश में उसका विशेष रूप से उपलभ्भ होता है। जैसे चन्द्र के सम्बन्ध से राहु का दर्शन होता है, वैसे ही शुद्ध बुद्धि के सम्बन्ध से परमात्मपद का दर्शन होता है। भावना-भावित भगवान की सगुण मूर्ति की वास्तविक दिव्य मूर्तिरूप में व्यक्त होती है। भगवान सर्वत्र होते हुए भी मायाजवनिका (पर्दे) से ढके हैं। उसे हटाकर वे जहाँ से चाहें वहाँ से व्यक्त हो सकते हैं। पाषाण से भी मायाजवनिका को हटाकर भगवान प्रह्लाद के लिये प्रकट हो सकते हैं, तब फिर शुद्ध बुद्धी ही तो भगवान के उपलम्भ का साधन है।
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