🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩
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🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹🔱 💠 भक्ति ⚜ सुधा 💠 🔱🌹
【 गत ब्लॉग से आगे 】
🌟 संकल्पबल :
किरणों को पार करने में नेत्रों या अन्यान्य अंगो को कुछ भी कठिनाई नहीं मालूम पड़ती, परन्तु आतप की तेजी से जब उन्हीं किरणों का सूक्ष्म जल बादल बन जाता है, तब वही दर्शन में प्रतिबन्धक हो जाता है। नेत्र के बीच में बादल होने से सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, पर्वत आदि कोई चीज नहीं दिखाई देती, वही जल किरणों में रहकर नेत्र शक्ति का प्रतिबन्धक नहीं होता । बादल रूप में व्यक्त होने पर नेत्रशक्ति की रुकावट हो जाती है, परन्तु चलने - फिरने में उससे कुछ भी वाधा नहीं पड़ती। बादल में कोई खूब चल-फिर, दौड़ सकता है। जब वही चीज जल बन जाती है, तब चलने-फिरने में भी कुछ-कुछ रुकावट पड़ने लगती है, परन्तु जब वही बर्फ बन जाती है तब तो उसमें कठोरता इतनी आ जाती है कि बर्फ के भीतर फँसा हुआ प्राणी टस-से-मस भी नहीं हो सकता।
वही बर्फ बहुत पुरानी होकर जब किसी रत्न के रूप में परिणत हो जाती है, तब तो उसका टूटना ही बड़ा कठिन हो जाता है। इस तरह जैसे सूक्ष्म चीज ही क्रमेण स्थूल और कठोर हो जाती है, उसी तरह सूक्ष्म मनोमय जगत् ही अभिनिवेश के कारण स्थूल हो जाता है। अर्थात् भगवान् ही अभिनिवेश की अधिकता से गाढ़ होते होते स्थूल प्रपंच बन जाते है। उसके स्थूल या सूक्ष्म बनाने की पद्धतियाँ जिन्हें मालूम हैं, वे लोग सहज ही में स्थूल को सूक्ष्म और सूक्ष्म को स्थूल बना लेते हैं। वही बर्फ, आतप या अग्नि से जल-भाप आदि बनकर फिर सूक्ष्म हो जाती है। वैसे ही संकल्प की ही महिमा से स्थूल जगत् सूक्ष्म और सूक्ष्म - स्थूल बन जाता है।
तात्पर्य यह है कि प्राणी के पास संकल्प नाम की एक ऐसी चीज है कि उसे कामधेनु, चिन्तामणि या कल्पतरु कुछ भी कह सकते हैं। बुरे कर्मों को छोड़कर अच्छे कर्मों, आराधनाओं, तपस्याओं में लगे रहने पर संकल्प या विचार की शक्ति मजबूत हो जाती है। पौर्वापर्यानुसंधानशून्य दृढ़ संकल्प में प्राणी सब कुछ प्राप्त कर सकता है। जैसे वायुस के योग से जल ही तरंग बन जाता है, उसी तरह मननी शक्ति के योग से अखण्डबोध-स्वरूप परमात्मा ही विचार या संकल्प बन जाता है।
【 शेष आगे के ब्लॉग में 】
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹: कृष्णा श्री राधाप्रेमी : 🌹
https://www.facebook.com/shriradhapremi/
🌹 एक बार प्रेम से बोलिए ...
🙌🏻 जय जय श्री राधे ....🙌🏻
🌹 प्यारी .. श्री .. राधे ..🌹
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किरणों को पार करने में नेत्रों या अन्यान्य अंगो को कुछ भी कठिनाई नहीं मालूम पड़ती, परन्तु आतप की तेजी से जब उन्हीं किरणों का सूक्ष्म जल बादल बन जाता है, तब वही दर्शन में प्रतिबन्धक हो जाता है। नेत्र के बीच में बादल होने से सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, पर्वत आदि कोई चीज नहीं दिखाई देती, वही जल किरणों में रहकर नेत्र शक्ति का प्रतिबन्धक नहीं होता । बादल रूप में व्यक्त होने पर नेत्रशक्ति की रुकावट हो जाती है, परन्तु चलने - फिरने में उससे कुछ भी वाधा नहीं पड़ती। बादल में कोई खूब चल-फिर, दौड़ सकता है। जब वही चीज जल बन जाती है, तब चलने-फिरने में भी कुछ-कुछ रुकावट पड़ने लगती है, परन्तु जब वही बर्फ बन जाती है तब तो उसमें कठोरता इतनी आ जाती है कि बर्फ के भीतर फँसा हुआ प्राणी टस-से-मस भी नहीं हो सकता।
वही बर्फ बहुत पुरानी होकर जब किसी रत्न के रूप में परिणत हो जाती है, तब तो उसका टूटना ही बड़ा कठिन हो जाता है। इस तरह जैसे सूक्ष्म चीज ही क्रमेण स्थूल और कठोर हो जाती है, उसी तरह सूक्ष्म मनोमय जगत् ही अभिनिवेश के कारण स्थूल हो जाता है। अर्थात् भगवान् ही अभिनिवेश की अधिकता से गाढ़ होते होते स्थूल प्रपंच बन जाते है। उसके स्थूल या सूक्ष्म बनाने की पद्धतियाँ जिन्हें मालूम हैं, वे लोग सहज ही में स्थूल को सूक्ष्म और सूक्ष्म को स्थूल बना लेते हैं। वही बर्फ, आतप या अग्नि से जल-भाप आदि बनकर फिर सूक्ष्म हो जाती है। वैसे ही संकल्प की ही महिमा से स्थूल जगत् सूक्ष्म और सूक्ष्म - स्थूल बन जाता है।
तात्पर्य यह है कि प्राणी के पास संकल्प नाम की एक ऐसी चीज है कि उसे कामधेनु, चिन्तामणि या कल्पतरु कुछ भी कह सकते हैं। बुरे कर्मों को छोड़कर अच्छे कर्मों, आराधनाओं, तपस्याओं में लगे रहने पर संकल्प या विचार की शक्ति मजबूत हो जाती है। पौर्वापर्यानुसंधानशून्य दृढ़ संकल्प में प्राणी सब कुछ प्राप्त कर सकता है। जैसे वायुस के योग से जल ही तरंग बन जाता है, उसी तरह मननी शक्ति के योग से अखण्डबोध-स्वरूप परमात्मा ही विचार या संकल्प बन जाता है।
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