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*निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः।*
*तस्य शास्त्रेऽधिकारोऽस्मिन् ज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित्‌।।*

उपनयनादि संस्कार सम्पन्न प्राणी ही श्रुति, स्मृति आदि के अध्ययन का अधिकारी होता है।

 *द्विजातिमापन्नों विमुक्तोवान्यदोषतः।*
*श्रुतिस्मृतिपुराणानां भवेदध्ययनक्षमः।।*

नृसिंहतापनीय उपनिषदादि ग्रन्थों में यह भी स्पष्ट है कि स्त्री और शूद्र सावित्री, प्रणव, यजु आदि का उच्चारण न करे। उनको उपदेश करने वाला और वे दोनों ही ऐसा करने से अधोगति को प्राप्त होते हैं।

पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा दोनों मे ही इस पर विचार किया गया है कि शूद्र आदिकों को उपनयन संस्कार का विधान नहीं है अतः वे वेदाध्ययनादि के अधिकारी नहीं है। इन बातों से कुछ लोग जातिद्वेष की कल्पना करते हैं, परन्तु वस्तु स्थिति की दृष्टि से ही शास्त्रों ने ऐसा नियम बनाया है। माँ बच्चे के हाथ से इक्षुदण्ड छीन लेती है परन्तु शर्करासिता बड़े प्रेम से बच्चे को प्रदान करती है।

इस विषय में द्वेष की कल्पना व्यर्थ है, माँ केवल हितबुद्धि से ही ऐसा करती है। इसी तरह शास्त्रों ने शूद्रों को वेदादि शास्त्रों का सार इतिहास-पुराणादि श्रवण द्वारा ज्ञात कराकर वेदादि के अध्ययन का निषेध किया है। जैसे हर एक यन्त्र से हर एक चीज नहीं बनती, वैसे ही हर एक शरीर से हर एक मन्त्र का उच्चारण ठीक नहीं। शास्त्रों के द्वारा ही इसका निर्णय होता है।

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