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🌹🌟 *राधे नाम संग हरि बोल* 🌟🌹
*※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※*
🔅 *संकल्पबल* :
{ *गत ब्लॉग से आगे* }
जब वशिष्ठ जी ने उससे वार्तालाप करना चाहा, तब उसने बड़े ही मधुर शब्दों में अपनी वेदना सुनायी। वह एक ब्रह्माण्ड के विधाता ब्रह्मा की तरुणी वासना थी। ब्रह्मा तो वृद्ध हो गये, परन्तु वह वासना तरुणी हो रही थी। ब्रह्मा विरक्त होकर ब्रह्माण्ड का उपसंहार करके ब्रह्मलीन होना चाहते थे। उस वासना की ओर उपेक्षा दृष्टि से देखते थे। यह उसे अच्छा नहीं लगता था। वह चाहती थी कि वशिष्ठ जी चलकर ब्रह्मा को समझाकर उन्हें उसके अनुकूल कर दें। कुतूहलवशात वशिष्ठ ने उसके साथ जाना पसन्द किया, और योगबल से एक शिला के भीतर स्थित ब्रह्माण्ड में दोनों ने ही प्रवेश किया। वह वासना सब लोकों का लंघन करती-करती ब्रह्मा के पास पहुँची और ब्रह्मा जी को समाधि से उठाया।
ब्रह्मा ने वशिष्ठ को देखकर उनका आतिथ्य किया। पुनश्च वशिष्ठ के पूछने पर उन्होंने सम्पूर्ण वृतान्त बताया और कहा कि यह मेरी ब्रह्मा बनने ही वासना थी, मेरी विरक्ति इसे असह्य है, परन्तु अब मैंने तत्त्वदृष्टि से इसे और उसके परिणाम जगत को जान लिया। अतः इस निस्सार संसार का उपसंहार करना चाहता हूँ। उस समय वशिष्ठ ने सम्पूर्ण उपसंहार की लीला देखी। यद्यपि कल्पना और उसके उपसंहार में कुछ क्रम और कार्यकारणभाव प्रतीत होता है, परन्तु वस्तुतः केवल दृढ़ अभिनिवशपूर्ण वासना से अतिरिक्त और कहीं भी कुछ भी नहीं।
संकल्प की विचित्रता से ही जगत की विचित्रता होती है। संकल्प ही बाह्य के प्रपंच के रूप में प्रकट होता है। जैसे काष्ठ के भीतर विविध पुत्रिका विद्यमान रहती हैं, वही कारक व्यापार से प्रकट होती है। उसी तरह मन के संकल्प में ही लीन सम्पूर्ण विश्व उचित कारण कलापों से प्रकट हो जाता है। जैसे मिट्टी या सुवर्णं के होने पर हो घट-शराबादि और कटक-मुकुटकुण्डलादि हो सकते हैं, अन्यथा नहीं; उसी तरह संकल्प के रहने पर ही विश्व की उपलब्धि होती है। जब मन ही हलचल है तभी द्वैत है। मन की हलचल न होने पर विश्व का पता ही नहीं लगता। संकल्प की अनेकरसता से ही विश्व की अनेकरसता भी अनुभूत होती है। इसीलिए यद्यपि कहीं विश्व को अव्यय और सनातन कहा गया है।
*एषोऽश्वत्था सनातनः। अश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।।*
तथापि विश्व की क्षणभंगुरता अबाधित ही रहती है। कूटस्थ नित्य केवल एक आत्मा ही है। परिणामी पदार्थ प्रवाहरूप से ही नित्य है।
{ *शेष आगे के ब्लॉग में* }
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ब्रह्मा ने वशिष्ठ को देखकर उनका आतिथ्य किया। पुनश्च वशिष्ठ के पूछने पर उन्होंने सम्पूर्ण वृतान्त बताया और कहा कि यह मेरी ब्रह्मा बनने ही वासना थी, मेरी विरक्ति इसे असह्य है, परन्तु अब मैंने तत्त्वदृष्टि से इसे और उसके परिणाम जगत को जान लिया। अतः इस निस्सार संसार का उपसंहार करना चाहता हूँ। उस समय वशिष्ठ ने सम्पूर्ण उपसंहार की लीला देखी। यद्यपि कल्पना और उसके उपसंहार में कुछ क्रम और कार्यकारणभाव प्रतीत होता है, परन्तु वस्तुतः केवल दृढ़ अभिनिवशपूर्ण वासना से अतिरिक्त और कहीं भी कुछ भी नहीं।
संकल्प की विचित्रता से ही जगत की विचित्रता होती है। संकल्प ही बाह्य के प्रपंच के रूप में प्रकट होता है। जैसे काष्ठ के भीतर विविध पुत्रिका विद्यमान रहती हैं, वही कारक व्यापार से प्रकट होती है। उसी तरह मन के संकल्प में ही लीन सम्पूर्ण विश्व उचित कारण कलापों से प्रकट हो जाता है। जैसे मिट्टी या सुवर्णं के होने पर हो घट-शराबादि और कटक-मुकुटकुण्डलादि हो सकते हैं, अन्यथा नहीं; उसी तरह संकल्प के रहने पर ही विश्व की उपलब्धि होती है। जब मन ही हलचल है तभी द्वैत है। मन की हलचल न होने पर विश्व का पता ही नहीं लगता। संकल्प की अनेकरसता से ही विश्व की अनेकरसता भी अनुभूत होती है। इसीलिए यद्यपि कहीं विश्व को अव्यय और सनातन कहा गया है।
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