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ब्राह्मण का मदिरा विन्दुपान और शूद्र का वेदाक्षर विचार उन दोनों के लिये हानिकारक होता है त्रैवर्णिको के लिये प्रणवयुक्त मन्त्र और शूद्र, स्त्रियों के लिये प्रणवरहित मन्त्र का ही जप विधान है। द्वादशाक्षर मन्त्र के विषय में कहा गया है कि यह मन्त्र सर्वसिद्धि प्रदायक है। स्त्री-शूद्रों के लिये वित्तार अर्थात प्रणवरहित, द्विजातियों के लिये सतार मन्त्र का जप ठीक है-

*द्वादशार्णों महामन्त्रः संर्वसिद्धिप्रदायकः।*
*स्त्रीशूद्राणां वितारोऽयं सतारस्तु द्विजन्मनाम् ।।*

ब्राह्मण अध्ययन-अध्यापन दोनों का अधिकरी है। क्षत्रिय-वैश्य वेदादि शास्त्रों के अध्ययन का अधिकरी है, अध्यापन का नहीं। शूद्र, स्त्री आदि इतिहास-पुराणादि का श्रवण करके उपासना, ज्ञान और अपने अधिकारनुसार कर्मों का ज्ञान प्राप्त करके प्रवृत हों, तो उसी से उनका कल्याण होगा।

इस तरह वेदादि शास्त्रों, प्रणवादि मन्त्रों में जाति विशेष की अपेक्षा होती है, संस्कारों की अपेक्षा होती है, श्मशानादि एवं अन्यान्य अपवित्र स्थानों, सूतक-पातकादिवालों को बचाकर पवित्र देश-काल में संस्कार सम्पन्न होकर आदि मन्त्रों का जप कल्याण कारक होता है।

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