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🔅 *संकल्पबल* :
       
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*‘संघे शक्तिः क्लौयुगे’* विश्व कल्याण धर्म की जय के लिये अधिक संख्या में द्रव्य दान करने से भी संकल्प बनना बड़ी चीज है। द्रव्यदान भूल सकता है, परन्तु तीन सौ साठ दिन एक-एक मिनट भी धर्म-जय का संकल्प बहुत हो सकता है। द्रव्यदान कोई ही कर सकता है, परन्तु संकल्प सभी चला सकते हैं। किसी विषय में कायिक-वाचिक किसी भी प्रयत्न के करने पर उस विषय में प्रेम हो जाता है। उसकी सुरक्षा में प्रसन्नता, बिगडने में दुख होता है। विशेषतः मानस परिश्रम कर लेने पर तो उसमें और अधिक अनुराग हो जाता है।

किसी कार्य में अनुराग हो जाना ही सबसे बड़ा कार्य है। धर्म के प्रति ममता होती है। फिर यह भी ध्यान आता है कि जब हम धर्म की उन्नति चाहते हैं, तब उसका अनुष्ठान भी करना चाहिये अधर्म की निवृत्ति चाहते हैं, तब उससे बचना भी चाहिये। विचार के उपरान्त वह स्वयं और अपने इष्टमित्रों को अधर्म से निवृत्त करके धर्म में प्रवृत करेगा। बस ऐसा ही अधिक लोगों की प्रवृति हो जाने से धर्म की रक्षा होती है। संकल्प के साथ-साथ यदि मन्त्र का भी बल होता है। तो सुवर्ण में सुगन्ध हो जाता है। संकल्प बुरे कर्मों से कमज़ोर हो जाता है। अच्छे कर्मों से भावना या संकल्प मजबूत होते हैं। तपस्या, सत्कर्म और उत्तम मंत्रों के जप से जुड़कर संकल्प का बल दुगुना हो जाता है।
मनु लिखते हैं- ब्राह्मण केवल जप से ही सिद्ध हो सकता है। और कुछ करे या न करे।

*जप्येनैव तु संसिद्ध्येत् ब्राह्मणो नाऽत्र संशयः।*
*कुर्य्यान्यन्न वा कुर्य्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते।।*

भगवान भी गीता में जप यज्ञ को सब यज्ञों में श्रेष्ठ बतलाते हैं-
*‘यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि’*

मन्त्रों की महिमा सभी शास्त्रों ने गायी है, अन्यान्य सम्प्रदाय के लोग भी मन्त्र की महिमा मानते हैं।

{ *शेष आगे के ब्लॉग में* }

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