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🌹🔱 💠 *भक्ति ⚜ सुधा* 💠 🔱🌹
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  🌹🌟 *राधे नाम संग हरि बोल* 🌟🌹
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🔅 *संकल्पबल* :
       
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यदि मानस अनुचित कर्म करता रहेगा, तो अभ्यास बड़ जाने पर न चाहते हुए भी बुरे कर्मों को करना ही पड़ेगा। जैसे गमनजन्य वेग के बढ़ जाने पर, गमन क्रिया में स्वतन्त्रता की भी स्वतन्त्रता तिरोहित हो जाती है, उसी तरह मननजन्य वेग के बढ़़ जाने पर मनन क्रिया में स्वतन्त्र मन्ता की भी मनन में स्वाधीनता छिप जाती है। इतना ही नहीं, किन्तु परधीनता का भी स्पष्ट अनुभव होने लगता है। इसी तरह बुरे कर्मों के संकल्पों को धाराबद्ध हो जाने पर उनका रोकना अपने वश में नहीं रहतां इसलिये अच्छे कर्मों के संकल्पों को चलाना और बुरे कर्मों के संकल्पों को रोकना परमावश्यक है।
सारांश यह है कि संकल्प ही विश्व का मूल है। उसी पर उन्नति, अवनति दोनों निर्भर हैं। इसीलिए शास्त्रों ने बार-बार उत्तम विचार, दृढ़ संकल्प की महत्ता गायी है। बन्ध-मोक्ष में भी भावना की ही प्रधानता दी गयी है। अपने को कर्ता, भोक्ता, सुखी-दुःखी, बुद्ध मानने वाला प्राणी बद्ध रहता है। अपने को नित्य शुद्ध, वुद्ध, मुक्त मानने वाला प्राणी मुक्त हो जाता है। मैं कुछ भी नहीं कर सकता, अत्यन्त दीन-हीन प्राणी सर्वदा पुरुषार्थ लाभ नहीं कर सकता। भगवदाश्रित होकर भगवद्दत साधनों का आलम्बन करके सब कुछ कर सकता हूँ ऐसा निश्चयवान प्राणी पुरुषार्थ लाभ कर सकता है। इसीलिये श्रुति प्रोत्साहन देती है-

*उत्थातव्यं जागृतव्यं योक्तव्यं भूतिकर्मसु।*
*भविष्यतीत्येव मनः कृत्वा निश्चयमात्मनः।।*

अगर अनुष्ठान न भी हो सके, तब भी तत्संकल्प परम लाभदायक होते हैं अतः धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावाना हो, विश्व का कल्याण हो ऐसे संकल्पों का प्रवाह चलाना देश, समाज, विश्व एवं अपने लौकिक, पारलौकिक सर्व प्रकार के कल्याण का परम कारण है। सिद्ध पुरुषों का एक ही संकल्प पर्याप्त होता है परन्तु सर्वसाधारणों के अकेले संकल्प में ऐसा सामर्थ्य नहीं होता। अतः सामूहिक संकल्प आवश्यक है। एक ही शक्ति अकिंचित्कर होने से ही, कलि में संघशक्ति का महत्त्व वर्णित है।

{ *शेष आगे के ब्लॉग में* }

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