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🔅 *श्री शिवतत्त्व* :

{ *गत ब्लॉग से आगे* }

निःस्तब्ध समुद्र से ही तरंग की उत्पत्ति, उसी में उसका पालन, अन्त में फिर भी उसी में संहार होता है। उत्पादनावस्था के नियामक ब्रह्मा, पालनावस्था के नियामक विष्णु और संहारावस्था एवं कारणावस्था के नियामक शिव हैं। पहले भी करणावस्था रहती है, अन्त में भी वही रहती है। इस तरह प्रथम भी शिव ही, अन्त में भी शिव ही तत्त्व अवशिष्ट रहता है-

*‘‘अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्।*
*पश्चादहं यदेतच्च योऽवष्शिष्येत सोऽस्म्यहम्।।’’*

तत्त्वज्ञ लोग उसी में आत्मभाव करते हैं, जो चराचर प्रपंच की उत्पत्ति के पहले होता है। उसकी महिमा और वीर्यवत्ता प्रसिद्ध ही है। अतः वही मुख्य निरुप चरित ईश्वर या महेश्वर होता है।

अतः शिव जी ही ईश्वर शब्द से कहे जाते हैं।
*‘‘ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानाम्।’’*
*‘‘महेश्वरस्त्र्यम्बक् एवं नापरः।’’*
*‘‘ईश्वर सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।’’*

अर्थात ईशान ही सर्व विद्याओ एवं भूतों के ईश्वर हैं, वही महेश्वर हैं, वही सर्व प्राणियों के हृदय में रहते हैं। हृदय में ही सुषुप्ति होती है, वहीं कारणवस्था के अधिपति का होना युक्त भी है। कहीं उपनिषदों में एकादश प्राणों को ‘रुद्र’ कहा गया है। वे निकलने पर प्राणियों को रुलाते हैं, इसलिये रुद्र कहे जाते हैं। अतः दस इन्द्रियाँ और मन ही एकादश रुद्र हैं। परन्तु, ये आध्यात्मिक रुद्र हैं। आधिदैविक एव सर्वोपाधिविनिर्मुक्त रुद्र इनसे पृथक हैं, व अहंकार के अधिष्ठाता हैं-

*‘‘एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे।’’*

अर्थात रुद्र ही एक तत्त्व था, द्वित्वसंख्यापूर्त्यर्थ कोई दूसरा तत्त्व ही न था।

{ *शेष आगे के ब्लॉग में* }

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