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🔅 *श्री शिवतत्त्व* :

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 यही प्रचण्ड कोपरूप भी है, कोप का कार्य मृत्यु है। फिर जो मृत्यु का भी मृत्यु है उसकी कोपरूपता में क्या सन्देह है? सर्वसंहारक प्रचण्ड उग्र शासक परमात्मा ही ईश्वर, ईशान, उग्र, रुद्र, चण्ड एवं चण्डिका आदि शब्दों से व्यवहृत होता है।

वेदान्त की दृष्टि से अज्ञानी लोग सर्वविधभेदशून्य, स्वप्रकाश, अद्वैत ब्रह्म से डरते है।

*‘‘योगिनो बिभ्यति ह्यस्मादभ्रये भयदर्शिनः।’’*

जैसे नीम के कीड़े को शर्करा से उद्वेग होता है, वैसे ही सप्रपंच द्वैतसुख के कीट अज्ञानियों को निष्प्रपंच अद्वैतसुख से भय होता है, क्योंकि उनके अभिलषित वादित्र, नृत्य गीतादि द्वैतसुख का वहाँ अत्यन्ताभाव होता है। परन्तु, ज्ञानियों को तो वही परमानन्दरसरूप है। इसी तरह अज्ञानियों को उद्वेजक होता हुआ भी वह तत्त्वज्ञानियों को परमरसामृतरूप होकर प्रकट होता है।

विवेकियों की दृष्टि में प्रमाद ही मृत्यु है-
*‘‘प्रमाद वै मृत्युमहं ब्रवीभि।’’*

उन समस्त प्रमादों की जड़ मोह या अज्ञान ही है और उसका अन्त करने वाला ब्रह्माकार चरम वृत्ति पर आरूढ़ शुद्ध ब्रह्म ही है। इस तरह मृत्युरूप अज्ञान का नाशक होने से सर्वसंहारक महामृत्युंजय महाकालेश्वर परम तत्त्व शिव ही है। वे ही लीलयार्थ दिव्यमंगलमयी मूर्ति धारण करते हैं, भक्तों की अपनी उपासना में चावपूर्वक प्रवृति देख, कुतूहलवश स्वयं भी भक्तिरस का आस्वादन करने के लिये अपने आपको उपास्य-उपासक दो रूप में व्यक्त करते हैं। बाल रामचन्द्र, बाल मुकुन्दरूप से निज हस्तारविन्द के अंगुष्ठ को मुखारविन्द में विनिवेशित कर चरणारविन्द-मकरन्द-लुब्ध भावुक मनोमिलिन्दों के लोकोत्तर सौभाग्य को समझकर स्वयं भी भक्त होकर श्रीशिव की उपासना करते हैं और शिव जी के रूप से विष्णुरूप की उपासना करते हैं।
शिव के हृदय में राम, राम के हृदय में शिव हैं। साम्राज्यसिंहासनसमासीन भगवान राम के हृदयकमल में अभिव्यक्त श्रीशिव का प्रत्यक्ष दर्शन महर्षियों ने किया और शिव के हृदय में राम के प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। इस तरह *‘सेवक स्वामि सखा सिय पिय के’* शिव सर्वाराध्य परम दैवत हैं।

{ *शेष आगे के ब्लॉग में* }

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