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🌹🔱 💠 *भक्ति ⚜ सुधा* 💠 🔱🌹
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  🌹🌟 *राधे नाम संग हरि बोल* 🌟🌹
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🔅 *संकल्पबल* :
       
{ *गत ब्लॉग से आगे* }

शब्दों का प्रभाव स्पष्ट ही है। किन्हीं वाग्विन्यासों से मित्र भी शत्रु बन जाते हैं, किन्हीं से शत्रु भी मित्र बन जाते हैं। तात्पर्य यह कि वर्णों के संश्लेष-विश्लेष की विचित्रता से शब्दों में विचित्रता और उनसे प्रभावों में भी वैलक्षण्य हुआ करता है। उनमें भी कुद शब्द तो अर्थबोध कराकर उसके द्वारा विचित्र प्रभाव पैदा करते हैं, परन्तु कोई अर्थबोध के बिना ही श्रवणमात्र से आनन्दित करते हैं, उसी अर्थ को एक शुष्क व्यक्ति– *‘शुष्क वृक्षस्तिष्ठत्यग्रे’* कहकर बोलता है, उसी को एक सरस व्यक्ति *‘नीरसतरुरिह विलसति पुरतः।’* कहकर बोलता है।

स्वर विशेष आदि की महिमा से भी शब्दों और भावों में रोचकता आ जाती है। उसके द्वारा प्रभाव भी अद्भुत पड़ता है। विराम (टोन या तर्ज, मुखाकृति, मुद्रादि) के भेद से भी अर्थ के भाव-प्रभाव में भेद पड़ा करता है, परन्तु कोई-कोई शब्द अर्थबोध बिना, स्वरसम्पत्ति आदि बिना, रोचकता बिना अपना प्रभाव जापक या श्रावक पर पैदा करते हैं। इसी कोटि में मन्त्र आदि आते हैं। कितने शावरी मन्त्र विभिन्न प्राकृत भाषाओं में हैं कि उनका अर्थ आदि कुछ भी नहीं प्रतीत होता, परन्तु उनके प्रयोग का फल विलक्षण होता है।

*गुग्गा गुग्गा तेरी थाली।*
*जा बैठी पिप्पल की डाली।।*

इत्यादि सर्प के मन्त्र हैं। उनके अर्थों का पता नहीं लगता। फिर भी फल होता ही है।

गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं:-

*कलि विलोकि जगहित हर गिरिजा।*
*शावर मन्त्रजाल जिन सिरिजा।।*
*अनमिल आखर अर्थ न जापू।*
*प्रकट प्रभाव महेश प्रतापू।।*

{ *शेष आगे के ब्लॉग में* }

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