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🔅 *संकल्पबल* :
       
{ *गत ब्लॉग से आगे* }

 युद्धकाल में मित्रराष्ट्र भी रोमन लिपि के वी (V) अक्षर को अपने सभी स्थानों में लिखवाते थे। सभी कर्मचारी अपने मकानों, मोटरों पर ‘वी’ लिख रहे थे, इसका मतलब यही कि यदि अधिक लोग हमारी विजय की भावना करेंगेा, तो हमारी विजय होगी। आधुनिकों ने भी भावना की महिमा मान लिया है। हमारे सनातन वैदिक धर्म में तो संकल्प की इतनी महिमा है कि उसके बिना कोई कर्म ही नहीं होता। हर एक कर्मों में फिर चाहे वह सकाम हो या निष्काम, संकल्प परमावश्यक है। विष्णुस्मरण देशकाल नाम गोत्रकीर्त्तन करके संकल्प किया जाता है। वही पाठ जप आदि जिस संकल्प से किया जाता है, वैसा उसका फल होता है।

भले ही ‘रामायण’, ‘सप्तशती’ आदि में कुछ भी वर्णन हो, परन्तु जिस संकल्प से उनका पाठ, जप, संपुट आदि होगा, वही उनका फल होगा। इसीलिये एक संकल्प से ही अधिक अनुष्ठान होना आवश्यक है।, जहाँ तक हो संकल्प के शब्द भी एक ही से हों और वे संस्कृत के हों, प्रभावशाली हों। धर्मसंघ ने *तत्सदद्येत्यादि धर्मग्लान्यधर्माभ्युत्थान* निवृत्तिपूर्वक धर्मसस्थापन द्वारा *‘‘भगवत्प्रीत्यर्थ अमुकमन्त्रस्य जपं करिष्यामि’’* ऐसा संकल्प रखा है। जहाँ तक हो सभी विश्व कल्याणकारियों को इसी संकल्प से अनुष्ठानादि करना चाहिये। यद्यपि संकल्प मानस है तथापि शब्द के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। पवित्र शब्दों- आर्ष शब्दों से संकल्प की शक्ति बढ़ जाती है।

ईश्वर और योगी का संकल्प विचित्र सामर्थ्य सम्पन्न होता है। विभिन्न योगियों ने अपने संकल्प से विश्व का निर्माण कर लिया है, परमेश्वर का ज्ञान या संकल्प ही उनका तप समझा जाता है। उनके ज्ञानरूप तपस्या से ही विश्व बन जाता है। उसी तरह वशिष्ठ आदि महर्षियों ने भी संकल्परूप तपस्या से विश्व निर्माण का अनुभव किया था।
एक बार वशिष्ठ जी, निर्जीव आकाश में मनोमय कुटीर का निर्माण कर निर्विकल्प समाधि में स्थित हुए। बहुत काल के अनन्तर जब उनका समाधि से उत्थान हुआ जब उन्होंने एक युवती का वीणानिनादसमन्वित मधुर गीत सुना। उन्हें आश्चर्य हुआ कि अत्यन्त निर्जीव प्रदेश में हम समाधिस्थ हुए, यहाँ युवती का गीत कैसे सुनायी दे रहा है। जब उन्होंने उधर दृष्टि डाली तो कुछ भी दिखायी न दिया। जब उन्होंने अन्तर्मुख होकर सूक्ष्मदृष्टि से देखा तो मालूम हुआ कि वह किसी दूसरे ब्रह्माण्ड के आवरण में स्थित होकर गायन कर रही है।

{ *शेष आगे के ब्लॉग में* }

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