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🌹🔱 💠 *भक्ति ⚜ सुधा* 💠 🔱🌹
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🌹🌟 *राधे नाम संग हरि बोल* 🌟🌹
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🔅 *श्री शिवतत्त्व* :
{ *गत ब्लॉग से आगे* }
*‘‘महोदेव महादेव महादेवेति यो वदेत्।*
*एकेन मुक्तिमाप्नोति द्वाभ्यां शंभू ऋणी भवेत्।।’’*
ठीक ही है, वेदान्त-सिद्वान्तानुसार शब्द से ही तत्त्व का साक्षात्कार होता है। उपनिषदों, महावाक्यों एवं भगवत्स्वरूप-बोधक प्रणवादि नामों से तत्त्व साक्षात्कार होता है।
तत्त्व साक्षात्कार होते ही कल्पित संसार मिट जाता है। स्वाभाविक पारमार्थिक ब्रह्मानन्दरसामृत मुक्ति मिल जाती है। जैसे अमृतसागर में क्षार सागर की कल्पना भ्रान्ति से हीती है, वैसे ही परमानन्द-रसामृतमूर्ति शिवतत्त्व में भवसागर की भ्रान्ति होती है। अधिष्ठान के साक्षात्कार से कल्पना मिट जाती है। यह *‘‘नाम लेत भवसिन्धु सुखाही’’* का आशय है। दूसरी दृष्टि से जैसे तृण, वीरुध, औषधों के विचित्र सम्प्रयोग-विप्रयोग से विचित्र गुणों और दोषों का उद्भव-अभिभव होता है, वैसे ही वर्णों के विचित्र सम्प्रयोग-विप्रयोग में विचित्र शक्तियाँ होती हैं।
‘क’ ‘ख’ ‘ग’ ‘घ’ आदि वर्णों के ही जोड़ तोड़ से विचित्र वाङ्मय शास्त्र बने हैं। ‘राजा’ ‘जारा’, ‘नदी’ ‘दीन’ यह सब अर्थ-विपरिणाम वर्णों के आनुपूर्वी ही भेद से होते हैं। उन्हीं वर्णों के ऐसे भी जोड़-तोड़ होते हैं, जिनसे घोर-से-घोर शत्रु वश में हो जाते हैं। सर्प, वृश्चिक, पिशाच, राक्षस, देवता वश में हो जाते हैं। ऐसे विचित्र वर्णविन्यास होते हैं, जिनका मूल्य संसार में कुछ भी नहीं है। विद्वानो, कवियों, तार्किकों के वर्णविन्यास विशेष में ही खूबी है, किन्ही वर्णविन्यासों से परम मित्र भी शत्रु हो जाते हैं।
इस तरह अदृष्टविध्या भी भगवान के शिव, महादेव आदि नामों में विचित्र शक्ति है, जिससे प्राणी निष्पाप होकर परमतत्त्व का साक्षात्कार कर कृतकृत्य हो जाता है।
🔅 *शिवजी से शिक्षा* :
भगवान भूतभावन श्रीविश्वनाथ के चरित्रों से प्राणियों को नैतिक, सामाजिक, कौटुम्बिक अनेक प्रकार की शिक्षा मिलती है। समुद्र-मन्थन में निकलने वाले कालकूट विष का भगवान शंकर ने पान किया और अमृत देवताओं को दिया। राष्ट्र के नेता और समाज एवं कुटुम्ब के स्वामी का यही कर्तव्य है, उत्तम वस्तु राष्ट्र के अन्यान्य लोगों को देनी चाहिये और अपने लिये परिश्रम, त्याग तथा तरह-तरह की कठिनाइयों को ही रखना चाहिये। विष का भाग राष्ट्र या बच्चों को देने से वैमनस्य और उससे सर्वनाश हो जाएगा। शिव जी ने न विष को हृदय (पेट) में उतारा और न उसका वमन ही किया, किन्तु कण्ठ में ही रोक रखा। इसीलिये विष और कालिमा भी उनके भूषण हो गये। जो संसार के हित के लिये विषपान से भी नहीं हिचकते, वे ही राष्ट्र या जगत के ईश्वर हो सकते हैं।
समाज या राष्ट्र की कटुता को पी जाने से ही नेता राष्ट्र का कल्याण कर सकता है। कटुता का विष वमन करने से फूट और उपद्रव ही होगा। साथ ही उस विष को हृदय में रखना भी बुरा है। अमृतपान के लिये सभी उत्सुक होते हैं, परन्तु विषपान के लिये शिव ही हैं; वैसे ही फल भोग के लिये सभी तैयार रहते हैं, परन्तु त्याग तथा परिश्रम को स्वीकारने के लिये महापुरुष ही प्रस्तुत होते हैं। जैसे अमृतपान के अनुचित लोभ से देव-दानवों का विद्वेष स्थिर हो गया, वैसे ही अनुचित फलकामना से समाज में विद्वेष स्थिर हो जाता है।
{ *शेष आगे के ब्लॉग में* }
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