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🌹🔱 💠 *भक्ति ⚜ सुधा* 💠 🔱🌹
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🔅 *शिवलिंगोपासना-रहस्य* :
{ *गत ब्लॉग से आगे* }
गौर तेज श्रीराधिका में श्यामल तेज श्रीकृष्ण का मिलन होने पर महत्त्वप्रधान हिरण्यगर्भ उत्पन्न हुए। यह भी प्रकृति-पुरुष के संयोग से महतत्त्वादि प्रपंच की उत्पत्तिरूपक कही गयी है। इसी को यों भी समझ सकते हैं- जाग्रत, स्वप्न के अभिमानी, विश्व, तैजस और विराट हिरण्यगर्भ ये सभी सावयव हैं। किन्तु सर्व-लयाधिकरण ईश्वर निरवयव है, वह माया से आवृत होता है। अविद्या के भीतर ही रहने वाला तो जीव है, परन्तु जो *‘अत्यतिष्ठद्दशांगुलम्’* के सिद्धान्तानुसार अविद्या का अतिक्रमण कर स्थित है, वही ईश्वर है। निरावरण तत्त्व शिव है। ईश्वरभाव माया से आवृत और शिवभाव अनावृत है।
माया जलहरी है और उसके भीतर आवृत ईश्वर है, जलहरी के बाहर निकला हुआ शिवलिंग निरावरण ईश्वर है। जिसका पृथक-पृथक अंग न व्यक्त हो, वह पिण्ड के ही रूप में रहेगा। सुषुप्ति में प्रतीयमान विशिष्ट आत्मभाव का सूचक पिण्डी है। शिव के सम्बन्धमात्र से प्रकृति स्वयं विकाररूप में प्रवाहित होती है। इसलिये अर्धा गोल नहीं, किन्तु दीर्घ होता है। लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु, ऊपर प्रणवात्मक शंकर हैं। लिंग महेश्वर, अर्घा महादेवी हैं-
*‘‘मूले ब्रह्मा तथा मध्येविष्णुस्त्रिभुवनेश्वरः।*
*रुद्रोपरि महादेवः प्रणवाख्यः सदाशिवः।।*
*लिंगवेदी महादेवी लिंग साक्षान्महेश्वरः।*
*तयोः सम्पूजनान्नित्यं देवी देवश्च पूजितौ।।’’*
चैतन्यरूप लिंग सत्ता और प्रकृति से ब्रह्माण्ड बना। उनके सहारे ही वह लय की ओर जा सकेगा। अर्थात शुद्ध मोक्ष के लिये उसी के द्वारा पहुँचना होगा। यद्वा प्रणव में अकार शिवलिंग है, उकार जलहरी है, मकार शिवशक्ति का सम्मिलित रूप समझ लिया जाता है।
शिव ब्रह्म का स्थूल आकार विराट ब्रह्माण्ड है, ब्रह्माण्ड आकार का ही शिवलिंग होता है। निर्गुण ब्रह्म का बोधक होने से यही ब्रह्माण्ड लिंग है। अथवा उकार से जलहरी, अकार से पिण्डी और मकार से त्रिगुणात्मक त्रिपुण्ड कहा गया है। अथवा निराकार के आकाशरूप अकार, ज्योति:- सतम्भाकार तथा ब्रह्माण्डाकार आदि सभी स्वरूपों में शक्तिसहित शिवतत्त्व का ही निवेश है। सर्वरूप, पूर्ण एवं निराकार का आकार अण्ड के आकार का ही होता है। मैदान में खडे होकर देखने से पृथ्वी पर टिका हुआ आकाश अर्द्धअण्डाकार ही मालूम होता है। पृथ्वी के ऊपर जैसे आकाश है, वैसे ही नीचे भी, दोनों को मिलाने से वह भी अण्डाकार ही होगा। आत्मा से आकाश की उत्पत्ति है, यही निराकार का ज्ञापक लिंग उसका स्थूल शरीर है।
पंचतत्त्वात्मिका प्रकृति उसकी पीठिका है। आकाश भी अमूर्त्त और निराकार होने से विशेष रूप से तो प्रत्यक्ष होता नहीं, फिर भी वह कुछ है ऐसा ही निश्चय होता है। उसी का सूचक भावमय गोलाकार है। शिवब्रह्म निराकार होता है। उसी का सूचक भावमय गोलाकार है। शिवब्रह्म निराकार होता हुआ भी सब कुछ है, निर्विशेष ही सर्वविशेषरूप होता ही है। चिदाकाश में भी इसी तरह शिवलिंग की भावना है। इसी अण्डाकार रेखा से सक उत्पन्न होते हैं। यही किसी अंक के आगे आकर उसे दशगुना अधिक करता हैं।
{ *शेष आगे के ब्लॉग में* }
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