🚩🔱 ❄ *«ॐ»«ॐ»«ॐ»* ❄ 🔱🚩
🌹🔱 💠 *भक्ति ⚜ सुधा* 💠 🔱🌹
*※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※*
🌹🌟 *राधे नाम संग हरि बोल* 🌟🌹
*※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※*
🔅 *शिवलिंगोपासना-रहस्य* :
{ *गत ब्लॉग से आगे* }
कुछ महानुभावों का कहना है कि पूर्ण सौन्दर्य अपने में ही अपने प्रतिबिम्ब को अपने आप देख सकता है, भगवान अपने स्वरूप को देखकर स्वयं विस्मित हो जाते हैं-
*‘‘विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धे:।’’*
बस इसी से प्रेम या काम प्रकट होता है। इसी से शिवशक्ति का संमिलन होता है। वही श्रृंगाररस है। कामेश्वर-कामेश्वरी, श्रीकृष्ण-राधा, अर्द्धनारीश्वर वही है। पूर्ण सौन्दर्य अनन्त है, अप्सराओं को सौन्दर्य उसके सामने नगण्य है। उसी सौन्दर्य के कणमात्र से विष्णु ने मोहिनीरूप से शिव को मोह लिया। उसी के लेश से मदन मुनियों को मोहता है। वही सगुण रूप में कहीं ललिता, कहीं कृष्णरूप में प्रकट होता है-
*‘‘षोडशी तु कला ज्ञेया सच्चिदानन्दरूपिणी।’’*
*‘‘नित्यंकिशोर एवासौ भगवानन्तकान्तकः।।’’*
कभी आद्या ललिता ही पुंरूपधारिणी होकर कृष्ण बनती है, वही वंशीनाद से विश्व को मोहित करती है-
*‘‘कदाचिदाद्या ललिता पुंरूपा कृष्णविग्रहा।*
*वंशीनादसमारम्भादकरोद्विवशं जगत्।।’’*
प्रकृति पार, सौन्दर्य-माधुर्यसार, आनन्दरससार परमात्मा में भी शिव-पार्वती भाव बनता है। अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोत्पादिनी अनिर्वचनीय शक्ति विशिष्ट ब्रह्म में भी शिव-पार्वती भाव है। उस परमात्मा में ही लिंग योनिभाव की कल्पना है। निराकार, निर्विकार, व्यापक दृक् या पुरुषतत्त्व का प्रतीक ही लिंग है और अनन्त ब्रह्माण्डोत्पादिनी महाशक्ति प्रकृति ही योनि, अर्धा या जलहरी है।
न केवल पुरुष से सृष्टि हो सकती है, न केवल प्रकृति से। पुरुष निर्विकार, कूटस्थ है, प्रकृति ज्ञानविहीन जड़ है। अतः सृष्टि के लिये दृक्-दृश्य, प्रकृति-पुरुष का सम्बन्ध अपेक्षित होता है। ‘गीता’ में भी प्रकृति को परमात्मा की योनि कहा गया है-
*‘‘मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम्।*
*सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत।।’’*
भगवान कहते हैं- महद्ब्रह्म प्रकृति- मेरी योनि है, उसी में मैं गर्भाधान करता हूँ, तभी उससे महादादिक्रमेण समस्त प्रजा उत्पनन होती है। प्रकृतिरूप योनि में प्रतिष्ठिर होकर ही पुरुषरूप लिंग का उत्पादन करता है। अत एव बिना योनि-लिंग-सम्बन्ध के कहीं भी किसी की सृष्टि ही नहीं होती। हाँ, यह बात अवश्य समझ लेनी चाहिये कि लोक प्रसिद्ध मांस चर्ममय ही लिंग और योनि नहीं है, किन्तु वह व्यापक है। उत्पति का उपादानकारण पुरुषतत्त्व का चिह्न ही लिंग कहलाता है। दृश्य अण्डश्य ब्रह्म भी अदृश्य पुरुष ब्रह्म का चिह्न है और वही संसार का उपादान भी है। अतः वह लिंगपदवाच्य है। लिंग और योनि पुरुष-स्त्री के गुह्यांगपरक होने से ही इन्हें अश्लील समझना ठीक नहीं है।
{ *शेष आगे के ब्लॉग में* }
*※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※*
🌹प्रिय भगवद्भक्तजन... विभिन्न हिंदू धर्मग्रंथों के आधार पर भगवद्कृपा से शेयर हुऐ हमारे भक्तिमय लेख अगर आपको पसंद आते है और आप इन्हें अपने निजी मो. नं. पर या अपने भक्ति समूह में चाहते है तो हमें हमारे मो. नं. 9009290042 पर मैसेज करें।💐
🌹अब आप👇🏻नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करके हमारे लेख फेसबुक व गूगल ब्लॉग पर भी पढ़ सकते हैं। हमारे लेखों संबंधित पसंद, नापसंद या शंका समाधान हेतु अपने विचार हमें अवश्य व्यक्त करें हम आपके आभारी रहेंगे। 💐
🌹सत्चर्चा हेतु आप हमें प्रात: 9:00 से 10:00 बजे के मध्य फोनकॉल भी कर सकते हैं हमें आपके सत्संग से अति प्रसन्नता होगी 💐🙏
❄ *कृष्णा श्री राधाप्रेमी* ❄
https://www.facebook.com/shriradhapremi/
*※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※*
🌹۞☀∥ *राधेकृष्ण: शरणम्* ∥☀۞🌹
*※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※*
🌹एक बार *प्रेम* से बोलिए ..
🌸 जय जय *"श्री राधे"*🌹
🌹प्यारी श्री *"राधे राधे* 🌹
※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें