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🌹🔱 💠 *भक्ति ⚜ सुधा* 💠 🔱🌹
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🔅 *शिवलिंगोपासना-रहस्य* :
{ *गत ब्लॉग से आगे* }
जैसे गेहूँ, यव आदि में भी जिस भाग में अंकुर निकलता है उसे योनि जाना जाता है, दाने निकलने से पहले जो छत्र होता है वह लिंग है। ब्रह्मा या देवताओं के संकल्प से उत्पन्न सृष्टि का भी लिंग-योनि से सम्बन्ध है अर्थात शिव शक्ति ही यहाँ लिंग-योनि शब्द से विवक्षित है। उत्पत्ति का आधारक्षेत्र भग है, बीज लिंग है। वृक्ष, अंकुरादि सभी प्रपंच की उत्पत्ति का क्षेत्र भग है, बीज पुरुष, लिंग है। जैसे दृक्तत्त्व व्यापक है, वैसे ही दृश्य प्रकृतितत्त्व भी। तभी तो कभी लोकप्रसिद्ध योनि-लिंग के बिना भी मानसी संकल्पजा सृष्टि होती थी।
कहीं दर्शन से, कहीं स्पर्श से, कहीं फलादि से भी सन्तान उत्पन्न हो जाती थी। कहीं भी, कैसी भी, सृष्टि क्यों न हो, परन्तु वहाँ सृष्टि के उत्पादनानुकूल शिव-शिक्ति का सम्बन्ध अवश्य मानना पड़ता है। वृक्ष, लता, दूर्वा, तृणादि सभी तत्त्वों की उत्पत्ति में तदुपयुक्त शिव-शिक्त का सम्बन्ध अनिवार्य है। योगसिद्ध महर्षियों का प्रकृति पर अधिकार होता था। अतः ये संकल्प, स्पर्शन, अवलोकन आदि से ही सृष्टि के उपयुक्त लिंग-योनि-सम्बन्ध स्थापित कर सकते थे।
प्रसिद्ध लिंग और योनि ही असली लिंग योनि नहीं है। किन्तु यह तो उनकी अभिव्यक्ति का स्थान, केवल गोलक है। सर्वसाधारण लोग जिसे नेत्र समझते हैं वह नेत्र नहीं है, किन्तु वह तो अतीन्द्रिय नेत्र इन्द्रिय की अभिव्यक्ति का स्थान गोलक है, इन्द्रिय उससे पृथक सूक्ष्म वस्तु है। प्रसिद्ध नासिका या कान ही घ्राण और श्रोत्र नहीं, किन्तु यह सब तो गोलक है। घ्राण, श्रोत आदि इन्द्रियाँ तो अतिसूक्ष्म हैं, वे नेत्रादि के विषय नहीं है। फिर भी विशेषरूप से उनका इन गोलकों में प्राकट्य होता है, अत एव कभी जब इन गोलकों के ज्यों-के-त्यों बने रहने पर भी इन्द्रियशक्ति क्षीण हो जाती है, तब दर्शन, श्रवण, आघ्राण आदि नहीं होते। योगियों को घ्राण, श्रोत्र, नेत्र-सम्बन्ध बिना भी दूरदर्शन श्रवणादि होते हैं। उसी तरह लौकिक प्रसिद्ध लिंग-योनि आदि केवल गोलक हैं, उनमें व्यक्त होने वाला योनि-लिंग तो अतीन्द्रिय ही है। वैसे ही प्रजनन इन्द्रिय, वीर्य, रज आदि भी उसके मुख्य रूप नहीं, किन्तु उनसे भी सूक्ष्म, उनमें विशेषरूप व्यक्त दृक-दृश्य ही शिव और शक्ति है।
जैसे अग्नितादात्म्यापन्न लौह-पिण्ड में दाहकत्व, प्रकाशकत्व हो सकता है, वैसे ही पुरुष-प्रतिबिम्बोपेत ही अचेतन प्रकृति चेतित होकर विश्व का निर्माण करती है। जैसे पुरुष के सर्वांगसार वीर्य को पाकर ही योनि सन्तान रचती है, वैसे ही पुरुष-प्रतिबिम्ब भी पुरुष समानाकार पुरुष की प्रतिकृति ही होता है, उसी से अचेतन प्रकृति में भी चेतनता का संचार होता ही है। इधर मूर्तिपूजा का भी भाव यही होता है कि दृष्य से अदृशष्य की पूजा हो। शलग्राम में विष्णु की भावना होती है। केवल काष्ठ, पाषाण, धातु की पूजा नहीं होती, किन्तु मन्त्र और विधानों की महिमा से आहूत, संनिहित व्यापक दैवततत्त्व ही मूर्ति में आराध्य होता है। व्यष्टि के द्वारा ही प्रणियों के मन में समष्टिभाव का आरोहण होता है।
{ *शेष आगे के ब्लॉग में* }
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