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🌹🔱 💠 *भक्ति ⚜ सुधा* 💠 🔱🌹
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🌹🌟 *राधे नाम संग हरि बोल* 🌟🌹
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🔅 *श्री शिवतत्त्व* :
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भगवान श्रीकृष्ण के श्रीअंग का सौन्दर्य, माधुर्य अद्भुत है। और की कौन कहे, उस पर वे स्वयं मुग्ध हो जाते हैं। मणिमय स्तम्भों या मणिमय प्रांगण में प्रतिबिम्बित अपनी ही मधुर, मनोंहर, मंगलमयी मूर्ति को देख, उसके ही संमिलन और परिरम्भण के लिये वे स्वयं विभोर हो उठते हैं।
श्रीमूर्ति के प्रत्येक अंग-भूषणों को भी भूषित करते हैं। कौस्तुभादि मणिगणों ने अनन्त आराधनाओं के अनन्तर अपनी शोभा बढाने के लिये उनके श्रीकण्ठ को प्राप्त किया है, किंबहुना अनन्त गुणगणों ने भी अनन्त तपस्याओं के अनन्तर अपनी गुणत्वसिद्धि के लिये जिन, निर्गुण, निरपेक्ष का आश्रयण किया है, वे स्वयं श्रीकृष्ण जिसकी उपासना करें, जिस पर मुग्ध रहें, उसकी महिमा, मधुरिमा का कहना ही क्या? राधारूप से जिसे प्रतिक्षण हृदय एवं रोम-रोम में रखें वंशीरूप से अधरपल्लव पर रखें, जिनके स्वरूप का निरन्तर ध्यान करें, उनकी महिमा को कौन कह सकता है? शब्द, स्पर्श, रस, गन्ध के माधुर्य में प्राणियों का चित्त आसक्त होता है।
चित्त मैं अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय ब्रह्म का आरोहण कठिन होता है। इसलिये भगवान ऐसी मधुर, मनोहर मंगलमयी मूर्तिरूप में अपने आपको व्यक्त करते हैं, जिसके शब्द-स्पर्शादि के माधुर्य का पारावार नहीं, जिसके लावण्य, सौन्दर्य, सौगन्ध, सकुमार्य की तुलना कहीं है ही नहीं। मानों भगवान की सौन्दर्य-सुधाजलनिधि मंगलमूर्ति से ही, किंवा उसके सौन्दर्यादि-सुधासिन्धु के एक बिन्दु से ही अनन्त ब्रह्माण्ड में सौन्दर्य, माधुर्य, लावण्य सौगन्ध्य, सौकुमार्य आदि वित हैं।
जब प्राणी का मन प्राकृत कान्ता के सौन्दर्य, माधुर्यादि में आसक्त हो जाता है, तब अनन्तब्रह्माण्डगत सौन्दर्य, माधुर्यादि बिन्दुओं के उद्गम स्थान सौन्दर्यादि सुधाजलनिधि भगवान के मधुर स्वरूप में क्यों न आसक्त होगा? भगवान का हृदय भास्वती भगवती अनुकम्पा देवी के परतन्त्र है। संसार में माँगने वाला किसी को अच्छा नहीं लगता, उससे सभी घृणा करते हैं। परन्तु भगवान शंकर तो आक, धतूर, अक्षत, बिल्वपत्र, जलमात्र चढाने गला बजाने से ही सन्तुष्ट होकर सब कुछ देने को प्रस्तुत हो जाते हैं। ब्रह्मा जी पार्वती से अपना दुखड़ा रोते हुए कहते हैं।
*‘‘बावरो रावरो नाह भवानी।*
*जिनके भाल लिखी लिपि मेरी सुख की नाहिं निशानी।*
*तिन रंकन को नाक सँवारत हों आयों नकबानी।।*
*शिव की दई सम्पदा देखत श्री शारदा सिहाहीं।*
*दीनदयाल देहबोइ भावई यां जस जाहि सुहाहीं।।’’*
उनका भक्त एक ही बार प्रणाम करने से अपने को मुक्त मानता है। भगवान भी ‘महादेव’ ऐसे नाम उच्चारण करने वाले के प्रति ऐसे दौड़ते हैं, जैसे वत्सला गौ अपने बछड़े के प्रति
*‘‘महादेव महादेव महादेवेति वादिनम्।*
*वत्सं गौरिव गौरीशो धावन्तमनुधावति।।’’*
जो पुरुष तीन बार महादेव, महादेव, महादेव, इस तरह भगवान का नाम उच्चारण करता है, भगवान एक नाम से मुक्ति देकर शेष दो नाम से उसके ऋणी हो जाते है।
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